यू.पी. की हलचल – उत्तर प्रदेश में असुरक्षित महिलाएं

प्रांजलि ठाकुर लखनऊ में रहने वाली पत्रकार हैं जो अलग-अलग अखबारों के लिए लिखती हैं। वो उत्तर प्रदेश के ज्वलंत मुद्दों पर राज्य के कई बड़े अखबारों में काम कर चुकी हैं।

प्रदेश में महिलाओं के लिए पुलिस की तरफ से हेल्पलाइन चालू तो ज़रूर की गई है। मगर इससे हेल्प यानी मदद मिलना आसान नहीं है। पहले यहां मदद के लिए आप लाइन पर लगे रहिए, फोन व्यस्त होने का ही जवाब मिलेगा। अगर किस्मत से फोन लग गया तो फिर पुलिस समय पर नहीं पहुंचेगी। पूरे प्रदेश की बात तो छोड़ दें अगर राजधानी लखनऊ की बात करें तो पिछले छह महीने में एक सौ तेइस महिलाएं लापता हुई हैं। इन्हें खोजने में पुलिस नाकाम रही है। यह तो वह आंकड़े हैं जो थानों में दर्ज हैं। ताकतवर लोगों से जुड़े मामले दर्ज ही नहीं होते। बंद सूटकेस या बोरी में औरतों की लाश मिलने की घटनाएं भी आए दिन होती ही रहती हैं। मनोचिकित्सक कल्पना सिंह का कहना है कि अगर अपराधों की संख्या लगातार बढ़ रही है तो इसका मतलब है कि अपराधियों के हौसले बढ़े हुए हैं। यह अपराधियों के मन से कानून के प्रति खत्म होते डर को दिखाता है। उन्हें सज़ा पाने या पकड़े जाने का डर नहीं है। ऐसी स्थिति किसी भी समाज के लिए गंभीर है।

थानों में राजनीति किस कदर बढ़ गई है इसका उदाहरण मुख्यमंत्री द्वारा दी गई सलाह में मिलता है। वुमेन पावर हेल्पलाइन शुरू करते वक्त मुख्यमंत्री को कहना पड़ा कि जो लोग इससे जुड़े हैं वे थानों की राजनीति से दूर रहें। यानी सरकार थानों में चल रही राजनीति से अनजान नहीं है। यह कैसी राजनीति है? कौन इस राजनीति का मुखिया है? इसे समझना आसान नहीं है। यहां भी पावर और पैसा जमकर चल रहा है। केवल सलाह से इसमें सुधार नहीं होगा। इसके लिए सख्ती ज़रूरी है। लेकिन यह सख्ती कौन करेगा? क्योंकि सरकार से जुड़े कई नेता और दबंग इस राजनीति का हिस्सा हैं। हाल ही में लखनऊ के अलीगंज इलाके में बोरे में एक लड़की की लाश मिली। तो गोरखपुर में भी 2012 में दिल्ली में चलती बस में हुए बलात्कार की तरह की घटना घटी। यह बात दूसरी है कि इन घटनाओं को मीडिया में ज़्यादा जगह नहीं मिली। मगर यह घटनाएं बताती हैं कि अपराधियों के हौसले बुलंद हैं। प्रशासन मस्त है और जनता पस्त है।