यू.पी. की हलचल – इन्हें मुआवजा चाहिए, जीने का हक चाहिए

ZEBA2जेबा हसन नवभारतटाइम्स में वरिष्ठ संवाददाता हैं। यह पिछले 11 सालों से पत्रकारिता कर रही हैं।

खूबसूरत चेहरों की तरह उनकी ज़िन्दगी   भी खूबसूरत थी, लेकिन उनसे चाहत का दावा करने वालों ने ही उनकी ज़िन्दगी  को तबाह करने की कोशिश की। हम बात कर रहे हैं तेज़ाब हमले का सामना करनेवाली लड़कियों की। सरकार की भूमिका भी इन लड़कियों को बड़े-बड़े मंचों में सम्मान देने तक ही सिमट जाती है। मुआवज़े की घोषणाएं तो होती हैं मगर मुआवज़ा ज़्यादातर को नहीं मिलता।
हर जगह लगाई मदद की गुहार
तेज़ाब हमला किसी भी लड़की की जि़ंदगी का रिश्ता दर्द से जोड़ देता है। कविता भी एक ऐसी ही लड़की हैै। 17 जून 2012 को हुए हादसे को वह आज भी भुला नहीं पा रही। कविता को न तो सरकारी मदद मिली और न हीं इंसाफ। मुजरिम आज भी खुलेआम घूम रहा है। कविता कहती है कि हर मंच पर बहादुरी का सम्मान तो मिलता है, लेकिन ज़िन्दगी  जीने के लिए मदद नहीं। पुलिस अधिकारी से लेकर सीएम तक वह हर किसी से मदद की मांग कर चुकी है।
तरस नहीं जीने का हक चाहिए
कविता ने बताया कि वह नौकरी के लिए जहां भी जाती है, लोग कहते हैं कि घर पर रहो तुम कैसे काम करोगी। कविता कहती है कि कई बार सोचा कि आत्महत्या कर लूं। अपनी बनाई ज्वेलरी (जे़वर) बेचकर जो भी मिलता है, वह केस में खर्च हो जाता है। लोग मुझ पर तरस तो खाते हैं, मगर मदद को आगे नहीं आते। मुझे अपने पैरों पर खड़ा होना है। मैं ब्यूटीशियन और ज्वेलरी डिज़ाइनर बनना चाहती हूं, लेकिन कोर्स के लिए पैसे नहीं हैं। कानूनन मुझे मुआवजा मिलना चाहिए, लेकिन मुझे अब तक नहीं मिला।
प्रधानमंत्री से मिला सम्मान मगर मुआवज़ा नहीं
रेशम एक फरवरी 2014 को शाम करीब पांच बजे बाराबिरवा में कोचिंग से घर जा रही थी। रास्ते में उसका रिश्तेदार रियाज़ मिला। उसने बहाने से उसे गाड़ी में बैठा लिया। और शादी का दबाव बनाने लगा। उसने रेशम से ज़ोर ज़बरदस्ती करनी चाही तो रेशम ने विरोध किया। तिलमिलाए रियाज़ ने उसके चेहरे पर तेजाब फेंक दिया। रियाज़ को पुलिस ने गिरफ्तार किया। सत्रह साल की रेशम को 24 जनवरी 2015 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत अवॉर्ड से सम्मानित तो किया मगर मुआवज़ा अब तक नहीं मिला।