मुज़फ्फरनगर में स्थिति गंभीर, नेताओं ने मचाया बवाल

हुकुम सिंह
हुकुम सिंह

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर, बागपत और शामली जिलों में सितंबर के पहले हफ्ते में जाट और मुसलमान समुदाय के बीच सांप्रदायिक हिंसा को लेकर विधान सभा में 18 सितम्बर को बवाल मचा। मुज़फ्फरनगर की एक अदालत ने सोलह नेताओं पर भड़काऊ भाषण और दो समुदायों में हिंसा को बढ़ावा देने पर गैर ज़मानती वारंट जारी किए हैं।
आरोपी विधायकों में समाजवादी पार्टी, भाजपा, बसपा, कांग्रेस और भारतीय किसान यूनियन के नेता शामिल हैं। विधान सभा के बाहर पुलिस बड़ी संख्या में थी पर किसी विधायक की गिरफ्तारी नहीं हुई। उल्टा, भाजपा के विधायक ने सरकार को धमकी देते हुए कहा कि अगर बिना जांच के भाजपा के किसी विधायक की गिरफ्तारी हुई तो राज्य में माहौल और बिगड़ सकता है। पुलिस और प्रशासन का कहना है कि अगले दो दिन में यह गिरफ्तारी हो जाएगी।
मुज़फ्फरनगर और शामली जिलों में हज़ारों लोग डर और हिंसा के माहौल में अपने घरबार छोड़कर कैम्पों में रह रहे हैं। सरकारी आंकड़ों के हिसाब से चालीस हज़ार लोगों ने अपने गांव छोड़े हैं। 15 और 16 सितम्बर को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, कांग्रेस की सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने मुज़फ्फरनगर में दौरा किया। मुख्यमंत्री को लोगों ने गुस्से में काले झंडे दिखाए। प्रधानमंत्री ने लोगों से मुआवज़ा और इन्साफ दिलवाने का वादा किया।

शामली जिले के डी.एम. पी.के. सिंह और एस.पी. अनिल कुमार राय के अनुसार उनके जिले में ज़्यादा नुकसान नहीं हुआ, और अब माहौल शांत है। पर केवल कैराना ब्लाक के मलकपुर गांव में ही खुले आसमान के नीचे कुछ आठ हज़ार बेघर लोगों की कहानी कुछ और बताती है। शामली में ऐसे कई कैंप हैं जिन्हें समुदाय के लोग अपने बल पर ही चला रहे हैं। वे हज़ारों लोगों के रहने, खाने, और सुरक्षा की व्यवस्था कर रहे हैं।

शामली में एक कैम्प का दृश्य
शामली में एक कैम्प का दृश्य

महिलाओं ने बताईं अपनी कहानियां

बागपत जिले के छपरौली से आई अफसाना ने बताया कि गांव से भागते समय उसका पांच साल का बेटा छूट गया। उसका घर लूटा गया। इसी कैंप में कीर्थल गांव से रुकसाना के सामने उसके भाई का कत्ल हुआ। ऐसे कई और गांव और सैंकड़ों लोगों की कहानियां हैं जिनपर अभी कार्यवाही शुरू भी नहीं हुई, जो प्रशासन की नज़र में भी नहीं है। ऐसे में इसे शांति का माहौल किस आधार पर कहा जा रहा है?

हज़ारों लोग अपने घरों से दूर कैंप में जैसे तैसे परिवार सहित रह रहे हैं। 19 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह खुद आखिर तक राहत कार्य और पुनर्वास के काम पर कड़ी नज़र रखेगा।