मीडिया हेल्पलाइन की ज़रूरत

20 जनवरी को एबीवीपी के सदस्यों ने पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन को इलाहबाद विश्वविद्यालय के परिसर में आधे घंटे के लिए बंधक बना कर रखा। इन जाने माने पत्रकार को विश्वविद्यालय में सम्मलेन करने की अनुमति भी नहीं दी गयी। ज़ाहिर था कि इसके पीछे कारण ये था कि इनके विचार ऐसे थे जिन्हंे एबीवीपी के द्वारा ‘राष्ट्रविरोधी’ समझा जाता था। 24 जनवरी को उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री ने भारत में पहली मीडिया हेल्पलाइन – 1880 की शुरुआत की। इसका समय शायद इत्तेफाक ही था। मगर फिर भी ये उत्तर प्रदेश में और शायद पूरे देश में पत्रकारिता की स्थिति पर एक महत्त्वपूर्ण टिप्पणी के रूप में थी। पिछले साल दिसंबर में, ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ ने ऐसे स्थानों की सूची जारी की जो रिपोर्ट करने के लिए दुनिया में सबसे खतरनाक हैं। भारत इस सूची में तीसरे स्थान पर है। युद्ध से ग्रस्त सीरिया के नीचे। उस साल ही ‘द इम्प्यूटी इंडेक्स’ ने भारत को पत्रकारों के लिए सबसे प्रतिकूल वातावरण होने के लिए तेरह अन्य देशों के साथ रखा – जिनमें सीरिया, सूडान और पाकिस्तान शामिल थे। उससे भी ज़्यादा पत्रकारों के खिलाफ अपराध करने वालों को बिना सज़ा दिए छोड़ दिए जाने के लिए ऐसा किया गया। उत्तर प्रदेश में पिछले साल चार महीने के अरसे में तीन पत्रकार मारे गए। ये मौतें मुख्य समाचार बन गईं। जिसके कारण ‘प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया’ ने कहा कि उसको और शक्तियां ये हमारे देश में पत्रकारों के लिए सबसे अच्छा और सबसे बुरा समय है। लोकतंत्र का चैथा स्तम्भ कहे जाने वाली स्वतंत्र पत्रकारिता ने राजनीतिज्ञों, अपराधियों और व्यावसायिकों के हाथों बहुत नुक्सान झेला है। पत्रकारिता संघटन मज़बूत नहीं हैं और पत्रकारिता के खुद के आकार, रूप, तत्व में बदलाव आ रहा है। पत्रकारों, और पत्रकारिता को विभिन्न प्रभावों से बचाने की इससे पहले कभी इतनी ज़रूरी आवश्यकता नहीं रही है।

ऐसा करना ज़रूरी है ताकि वे पूरी और सच्ची कहानी बता सकें। इस सन्दर्भ में उत्तर प्रदेश की हेल्पलाइन सही दिशा में उठाया गया कदम है। इसे शक्तीहीन हेल्पलाइन न बनने दें बल्कि इसके द्वारा उन पत्रकारों को सुरक्षा प्रदान करें जो सच्चाई लिख रहे हैं फिर चाहे वो सच्चाई सत्ता में मौजूद सरकारों के खिलाफ ही क्यों न हो।