मिलिए, 8 साल की एक असाधारण कश्मीरी किकबॉक्सिंग चैंपियन ‘तजम्मुल इस्लाम’ से

kashmir girl

आठ साल की उम्र में बच्चे शायद खिलौनों से खेलना पसंद करते हैं लेकिन तर्कपोरा, उत्तरी कश्मीर के बांदीपुरा जिले के दूरदराज के एक गांव की आठ साल की ‘तजम्मुल इस्लाम’ के लिए बॉक्सिंग ही उसका प्रिय खेल है। कश्मीर और पूरी दुनिया में, तजम्मुल ने इस धारणा को गलत साबित कर दिया है कि किकबॉक्सिंग मात्र लड़कों का खेल नहीं है.पांच साल की उम्र से इस कला में माहिर होने का प्रशिक्षण लेने वाली तजम्मुल, एक सप्ताह में 30 घंटे अभ्यास करती हैं.

यह बात सही है कि बॉक्सिंग कमजोर दिल वालों के लिए नहीं है लेकिन तजम्मुल अपने लक्ष्य को पाने के लिए कड़ी मेहनत की है. एक असुविधाजनक गांव में रहते हुए, अपने रास्ते में आने वाली हर मुश्किल को तजम्मुल ने पार किया है.

सफलता की राह आसान नहीं होती. तजम्मुल ने भी अपनी राह में आने वाली तमाम कठिनाईयों को अपनी रोजाना की आदतों में शामिल कर लिया है. लड़ाई के मैदान में तजम्मुल बिना यह सोचे कि वह कैसी दिख रही हैं, मुक्केबाजी, पैर चलाना और पैरों से मारने की कला का अद्भुत प्रदर्शन करती हैं. वह एक डॉक्टर बनना चाहती थीं क्योंकि कश्मीर घाटी में किकबॉक्सिंग का कोई भविष्य नहीं है.

तजम्मुल एक ड्राइवर की बेटी हैं और वह पहली बार कश्मीर की तरफ से इटली, अन्द्रिया में नवम्बर में होने वाली वर्ड किकबॉक्सिंग चैंपियनशिप में भाग लेंगी. उन्हें पूर्ण विश्वास है कि वह यूरोप से गोल्ड मैडल लेके ही लौटेंगी.

वह कहती हैं कि “मैं अपने गांव को नई ऊंचाइयों पर ले जाने वाली हूँ और मुझे पूरा विश्वास है कि मैं अपने देश के लिए स्वर्ण जीत कर ही वापस आउंगी. आखिर मैं एक चैंपियन बनने वाली हूं”।

दुबली और फुर्तीली तजम्मुल, अपनी उम्र की सभी लड़कियों के लिए प्रेरणा है. जब वह साढ़े चार साल की थीं तब उन्होंने मार्शलआर्ट वाली फ़िल्म देखी थी जिसके बाद उन्हें मार्शलआर्ट से लगाव हो गया और शायद इसी वजह से ‘स्पाइडरमैन’ उनकी पसंदीदा फ़िल्म है.

तजम्मुल की उम्र में सुबह जल्दी उठना अक्सर मुश्किल काम होता है लेकिन वह इसे अपने लक्ष्य को पाने के लिए ‘नींद से समझौता’ करना कहती है. उनके अनुसार, “यह मेरे लिए प्रशिक्षण ही है जब अपने शरीर को सुनने के बाद मुझे निर्णय लेना होता है कि मुझे जाना है या रुकना है. तब मेरा इरादा और निश्चय ही मुझे मजबूत बनाता है”.

रोजाना अभ्यास के दौरान तजम्मुल अपने हाथों में कपड़े की पट्टियां बांधती हैं और फिर दस्ताने पहन कर मुक्केबाजी का अभ्यास करती हैं. उनका अभ्यास इतना जीवंत होता है कि जैसे वो सच में किसी से लड़ रही हो. वह बहुत ऊँची छलांग के साथ किक मारती हैं.

तजम्मुल की कोच का कहना है कि वो भले ही थक जाएं लेकिन तजम्मुल अभ्यास के खत्म होने तक लगातार लगी रहती हैं. उसका हाथ छोटा जरुर है लेकिन वह विरोधियों को हराने और जीत की ट्रोफी उठाने के काबिल है.

2015 नई दिल्ली, तालकटोरा में हुए नेशनल किकबॉक्सिंग चैंपियनशिप के सब-जूनियर श्रेणी में तजम्मुल ने 13 साल के प्रतियोगी को मात्र 15 मिनट में ही हरा कर गोल्ड मैडल हासिल किया था.

मार्च 2016, हरिद्वार में राष्ट्रिय स्तर पर खेले जाने वाली नेशनल वुशु चैंपियनशिप में तजम्मुल ने गोल्ड मैडल जीता. इस प्रतियोगिता में तजम्मुल ने अपने से लम्बे और शक्तिशाली प्रतियोगियों को हराया था.

2014 में ही तजम्मुल ने प्रशिक्षण और अभ्यास के लिए बांदीपोरा की मार्शल आर्ट अकादमी ज्वाइन कर ली थी. यही नहीं, दसवीं जम्मू और कश्मीर की स्टेट वुशु चैंपियनशिप में तजम्मुल को ‘सर्वश्रेष्ठ लड़ाके’ का ख़िताब दिया गया था.

इस्लाम शायद इस पहचान को कभी न समझ पाए लेकिन तजम्मुल आशा करती हैं कि आने वाले समय में वह अपनी घाटी का नाम ऊँचा करेंगी. वह कहती हैं, “बॉक्सिंग मुझे मजबूत और शक्तिशाली महसूस कराती है, शायद मैं पागल हूँ लेकिन यह रास्ता है”.