मिलिए झांसी के पहलवानों से इनका ख्वाब – एक दिन सुशील कुमार की तरह ओलम्पिक में भाग ले सकें

हाल ही में रिलीज हुई सुल्तान फ़िल्म ने युवाओं को खासा प्रभावित किया है। हालांकि कुछ युवा ऐसे हैं जो खुद पहलवानी करते हैं और फ़िल्म देख कर जोश में आ गये हैं। ऐसे ही कुछ युवा पहलवानों की मुलाकात हुई खबर लहरिया से…
झाँसी के रहने वाले पन्ना लाल खलीफा दस साल से लोगों को पहलवानी सीखा रहे हैं। अपने जवानी के दिनों में दांव-पेंच दिखाने वाले पन्ना लाल अब अपने बच्चों और युवाओं में अपनी जवानी देखते हैं। पन्ना लाल सागर खिड़की, बाहर में पिछले दस सालों से पप्पू पहलवान के नाम से अखाड़ा चलाते हैं। इनकी पहचान इनके युवा पहलवान शिष्य हैं जो सुशील कुमार की तरह ओलंपिक में जाने का सपना देखते हैं। उनका कहना है कि ‘जब तक मेरे हाथ पैर चल रहे हैं तब तक मैं इन बच्चों को पहलवानी सिखाता रहूँगा’।
पन्ना लाल के दो शिष्य जिला स्तर पर पहलवानी में पदक भी जीत चुके हैं। पन्ना लाल, मशहूर पहलवान दारा सिंह की कुश्ती के भी साक्षी रहे हैं। खबर लहरिया ने जब इनसे बात कि तो यह उत्साहित हो कर अपने गुरु और अपने हुनर के बारें में कुछ यूँ बताने लगे।
प्रमोद इस अखाड़े के सबसे बेहतरीन पहलवान हैं।इन्होंने जिला स्तर पर होने वाली ‘कुमार केसरी’ प्रतियोगिता में पदक भी जीता है। वह बताते हैं कि ‘जो भी नया शिष्य आता है उसे शुरूआती कसरत से पहलवानी सिखाई जाती है। उसके कुछ महीनों बाद दांव सिखाये जाते हैं’। प्रमोद पहले अपने पिताजी से सीखा करते थे और उनके जाने के बाद पन्ना लाला से सीखते हैं।
रवि, ‘भारत केसरी’ पदक जीत चुके हैं। रवि 12 सालों से पहलवानी में सक्रीय रहे लेकिन प्रतियोगिता के दौरान पैर में चोट लगने के कारण अब अखाड़े में ही पहलवानी सिखाते हैं।
अखाड़े के अन्य पहलवान शिष्य गुरु पन्ना लाल को अपने माता-पिता से बढ़ कर बताते हैं और अपनी पहचान और हुनर का सारा श्रेय पन्ना लाल को देते हैं।
लेकिन पहलवानी का दौर अब बदल चुका है जिसका प्रभाव इन युवा पहलवानों पर भी पड़ रहा है। सभी युवा पहलवान इस बात से परेशान हैं कि उनकी मेहनत का उन्हें कोई मोल नहीं मिलता। वह सभी जी-जान से प्रतियोगिताओं के लिए तैयार होते हैं लेकिन इसके लिए उन्हें आर्थिक रूप से कोई मदद नहीं मिलती।
जिलास्तर पर होने वाली पहलवानी की प्रतिस्पर्धाओं में भाग लेने के लिए उन्हें पूरे साल मेहनत करनी होती है। प्रत्येक पहलवान खिलाड़ी का प्रतिदिन का खर्चा हजार रुपए है। हालांकि सभी खिलाड़ी, पहलवानी के अलावा काम भी करते हैं लेकिन जिले में होने वाली साल भर में मात्र 10 प्रतियोगिताएं उन्हें निराश करती हैं।
पन्ना लाल का कहना है कि आधुनिकता ने इस क्षेत्र को भी नहीं छोड़ा है। पहलवानी गांव का खेल है जिसे हमारे जैसे लोग जिन्दा रखे हुए हैं लेकिन सरकार इस तरफ ध्यान नहीं देती।
इस बीच, पुराने शिष्य रह चुके प्रमोद कहते हैं कि वह अपने बच्चों को भी यही सिखाना चाहते हैं, वह चाहते हैं कि जो काम वो नहीं कर पाए उनके बच्चे उसे पूरा करें।
आशु पहलवान कहते हैं कि हम सब अपने काम-धंधे से गुजारा चला रहे हैं। परिवार को समय देने के बाद यहाँ अपना हुनर निखारते हैं लेकिन यदि इस तरफ सरकार भी मदद का हाथ बढाये तो हमें सुशील कुमार बनने से कोई नही रोक सकता। हम सब का सपना है कि हम भी ओलंपिक में जा कर झाँसी और अपने देश का नाम रोशन करें।
28/07/2016 को प्रकाशित

मिलिए झांसी के पहलवानों से
इनका ख्वाब – एक दिन सुशील कुमार की तरह ओलम्पिक में भाग ले सकें