मांस मंडी बीच बाज़ार से हटाने के लिए महोबा में भूख हड़ताल

Published on Nov 14, 2016

जिला महोबा, 16 नवम्बर 2016। महोबा बाजार में बनी मांस मंडी को हटाने के लिए वहां आस-पास के रहने वाले लोग 10 अक्टूबर से क्रमिक भूख हड़ताल पर हैं, जो 8 नवम्बर से अनिश्चित भूख हड़ताल में बदल गई है। ये लोग मांस मंडी को यहां से हटाना चाहते हैं, जिसका कारण मांस मंडी से होने वाली गंदगी है। प्रशासन ने मंडी को शहर से बाहर विस्थापित कर भी दिया है, पर दुकानदार अपनी जमी जमाई दुकानों को छोड़कर नहीं जाना चाहते हैं।

मांस मंडी यहां से हटाने की वजहों को बताते हुए यहां के निवासी पुष्पेन्द्र गुप्ता ,35, खासी नाराज होते हुए कहते हैं, “दुकानों का कूड़ा सड़कों पर फेंक दिया जाता है, जिसके कारण लोगों को गंदगी से गुजरकर जाना पड़ता है।” वह इन दुकानों को तीज त्यौहार में बन्द करने की भी बात कहते हैं।

मंडी के विरोध में तेजेंद्र पाटकर, 38, कहते हैं, “उनके दो भाईयों को इस गन्दगी से ब्लड फ्लू की बीमारी हुई थी।” हड़ताल पर बैठ़े नीरज रावत भी इन दुकानों को स्थानान्तरित करने की बात कहते हैं। हड़ताल में बैठे लोगों को आस-पास के निवासियों का पूरा सहयोग मिल रहा है, पर प्रशासन इस मुद्दे पर कुछ नहीं बोला है।

हालांकि इस मुद्दे पर हड़तालियों का ये भी कहना है कि नगर पालिका ने नगर प्रशासन को मंडी की 13 पंजीकृत दुकानों को नगर से बाहर स्थापित करने का आदेश दे दिया है पर नगर प्रशासन की ओर से इस दिशा में कोई काम नहीं हो रहा है।

शहर से दूर बनी 13 दुकानों में कोई दुकानदार नहीं जाना चाहता है। यहां मांस की दुकान चला रहे रईस अली ,45, कहते हैं, “मंडी में कुल मांस की 120 दूकानें हैं, जबकि हमें कुल 13 दुकानें दी गईं हैं। हमारी मांस मंडी में मांस, मछली और बीफ सब मिलता हैं। अब कितना सब कुछ कैसे इन 13 दुकानों में बिक सकता है?” मंडी के दुकानदारों में भी कुछ लोग नई जगह में जाना तो चाह रहे हैं पर बिना जरूरी सुविधाओं के नहीं। और वहीं कुछ लोग उन दूकानों में नहीं जाना चाह रहे हैं क्योंकि वे ये सोचते हैं कि दुकानें मरघट के पास होने के कारण ग्राहक वहां से दूरी ही बनाए रखेगा।

मांस की दुकान चलाने वाले संदीप कुशवाहा ,24, गुस्से में कहते हैं, “मैं अपने घर को चलाने वाला अकेला इंसान हूं। दुकान हटने से मुझे बहुत नुकसान होगा।“ वह इस मुद्दे को सांप्रदायिक रंग लेने की बात पर उत्तर देते हुए कहते हैं, “दुकान चलाने वाला अकेला मुसलमान नहीं हैं, बल्कि हिन्दू भी है।”

संतराम वर्मा ,38, भी इस मामूली बात को सांप्रदायिक रंग देने की बात कहते हैं। वह इस मुद्दे को ‘ग्रीन महोबा, क्लीन महोबा’ का नारा देने की बात बताते हैं, जो इस हड़ताल का नारा है। पर क्या इन मांस दूकानदारों को शहर से हटाने मात्र से महोबा साफ़ हो जाएगा? ये सवाल सब व्यापारी उठा रहे हैं। दुकानदारी नई जगह में सुरक्षा के लिहाज से भी नहीं जा रहे हैं क्योंकि वह सुनसान जगह पर हैं और इन लोगों का हजारों का सामान दूकान में पड़ा रहता है।

इस मामले में महोबा के उप प्रभागीय न्यायाधीश (एसडीएम) प्रबुद्ध सिंह का कहना हैं, “अभी दुकानदार बनी हुई दुकानों में जाएं फिर बाकी की दुकानें भी बनाई जाएगी।”