महोबा में राहुल गांधी, अब लोकसभा में उठेगा बुंदेलखंड का मुद्दा

rahul edयूपी में ऐसे लगता है कि राजनैतिक पदयात्रा का मौसम शुरू हो गया है। जनवरी 23 को कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ने महोबा जि़ले से अपनी पदयात्रा शुरू की। 2015 में बुंदेलखंड को सूखा-ग्रस्त घोषित किया था। राहुल गांधी का यह दौरा बुंदेलखंड का अब तक का सबसे हाई-प्रोफाइल दौरा है। राहुल के पीछे-पीछे यूपी के मुख्य मंत्री अखिलेश यादव भी इस क्षेत्र का दौरा लगा रहे हैं।
राहुल की पदयात्रा 7 किलोमीटर की थी। वह पैदल सूपा गांव से निकले, लाडपुर गांव में एक किसान के घर रुके और मुढ़ारी गांव में इंदिरा गांधी की मूर्ति का लोकार्पण किया। उनकी इस पदयात्रा में हज़ारो लोग इकट्ठा हुए। ऐसा लगा कि जनता और राहुल एक ही मंजिल की तरफ बढ़ रहे थे। लोग अपनी समस्याएं आगे रखना चाहते थे और राहुल उनके दिलों में जगह बनाना चाहते थे। खबर लहरिया पदयात्रा में शामिल था, वहीं की कुछ झलकियांः
जनता की मांगे
सूपा गांव के चैपाल में लक्ष्मी देवी ने माइक पर लोगों की समस्याओं को सामने रखा, जैसे मनरेगा के तहत काम या भुगतान ना मिलना, सूखा राहत ना मिलना, राशन कार्ड की गड़बड़ी, मिड्डे मील और पेंशन की शिकायत।
सहोदराबाई भी अपनी दिक्कतों के बारे में बोलना चाहती थीं, लेकिन उन्हें मौका नहीं मिला। जिनको मंच पर बोलना था उनका चयन पहले ही हो चुका था। यह भी तय था कि क्या बोलना है।
लाडपुर गाँव में राहुल देशराज कुशवाहा के घर में रुके। देशराज की पत्नी कम्मो के हाथ का बना आलू गोभी खाया। गांव में मजदूरी न मिलने के कारण, देशराज अक्सर दिल्ली जाता है। राहुल ने आश्वासन दिया कि मुआवजा मिल जायेगा।
राहुल का क्या जवाब है?
हर अनुभवी नेता की तरह राहुल ने गांव के लोगों  को सम्बोधित किया। कांग्रेस का गुणगान और विपक्षी दलों की निंदा की। उनको दुख इस बात का था कि उनकी सरकार न केंद्र में है, न राज्य में। भविष्य में कांग्रेस सरकार बनाती है तो उनका कहना था कि वह बुंदेलखंड के लिए कुछ करेंगे। क्या विपक्ष में रहकर भी कांग्रेस सरकार से जवाबदेही नहीं ले सकती है? महोबा को बस यह वादा दिया कि वह बुंदेलखंड का मुद्दा संसद तक पहुंचाएंगे।
मूर्ति का 50 साल से इंतज़ार
मुढ़ारी गांव के पंडित छविलाल पुरोहित ने 50 साल पहले पूर्व प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी की मूर्ति बनवाई थी। 1961 में इंदिरा मुढ़ारी आई थीं और उनका 65 किलो चांदी से तुलादान किया था। उसके बाद यह मूर्ति बनी। छविलाल चाहते थे कि गांधी परिवार से कोई आए और मूर्ति का लोकार्पण करे। पचास साल बाद राहुल इसका लोकार्पण करने मुढ़ारी आए हैं।
ज़रा सोचिए एक मूर्ति के लोकार्पण में पांच दशक बीत गए, तो वादों का क्या होगा? बुंदेलखंड की समस्या गंभीर है, तो लोगों की यही उम्मीद है कि यह मुद्दा सिर्फ राजनैतिक तू-तू-मैं-मैं तक सीमित न रहे, समाज का विकास भी हो।