महिला पत्रकारों की कलम से…सफरए संवाद और शिक्षा सवाल

khabar_lahariya_logo_12 (1)खबर लहरिया न्यूज़ नेटवर्क महिला पत्रकारों का एक समूह है । खबर लहरिया की पत्रकार का आंखों देखा हाल।

बांदा से महोबा जाने के रास्ते में मेरी मुलाकात इशिता से हुई। मैंने शाम पांच बजे बांदा बस स्टैंड से महोबा के लिए बस ली थी। बाइस साल की इशिता और मेरे बीच कब बात शुरु हो गई पता ही नहीं चला। उसने मुझे मोबाइल पर अपना इंस्टाग्राम प्रोफाईल दिखाया। बांदा और महोबा में जिंदगी के कुछ तस्वीरों से भरे इस प्रोफाईल में इशिता की जिंदगी के साथ बुंदेलखंड की जिंदगी भी दिख रही थी।
मैंने उसे बताया कि मैं पत्रकार हूं और यहां एक हफ्ते तक हूं। सूखे पर मुझे स्टोरी करनी है। उसने भी अपना परिचय दियाए बताया कि उसने बांदा के डिस्ट्रिक्ट इंस्टीट्यूट आफ एजुकेशन और ट्रेनिंग ;डायटद्ध से प्राइमरी स्कूल टीचर की ट्रेनिंग कि है।
मैंने इशिता से पूछा कि क्या तुम्हें टीचिंग अच्छी लगती हैघ् उसका जवाब था नहीं। मगर उसे बच्चों के साथ अच्छा लगता है। मैंने उसकी ट्रेनिंग और पाठ्यक्रम के बारे में पूछा। उसने बताया कि एक साल में एक से आठ तक के बच्चों के पाठ्यक्रम को पढ़ाने की ट्रेनिंग दी गई है। उसने बताया कि बाकी सारे विषय तो ठीक थे मगर गणित मुझे नहीं समझ ही नहीं आती। उसकी बात सुनते मुझे वह सारी रिपोर्ट याद आ रहे थे जिसमें बुंदेलखंड के गांवों में स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के शैक्षिक स्तर के बारे में खुलासे किए गए थे। सरकारी स्कूली बच्चों की कमजोर गणित हर रिपोर्ट में सामने आती रही है। कक्षा सात और आठ के बच्चे जोड़ घटाना तक नहीं जानते। गुणाभाग तो दूर की बात है।
हालांकि उसकी प्राथमिक चिंता यह नहीं थी कि टीचिंग कैसे करेगीघ् उसकी चिंता थी कि वह महोबा से बांदा स्कूल टाइम पर कैसे पहुंचेगीघ् उसके स्कूल का टाइम था नौ बजे जबकि महोबा से बांदा के बीच पचहत्तर किलोमीटर की दूरी थी। उसने मुझे बताया कि वह स्कूल प्रिंसिपल से बात करेगी। अगर वह मान गए तो फिर वह सुबह की बस लेगी और साढे दस बजे तक पहुंच जाएगी। उसकी यह बात सुनते सुनते फिर मुझे याद आने लगा कि गांवों में मां बाप स्कूल में टीचर के समय से न पहुंचने से कितने तंग हैं। स्कूल के बारे में जब भी बात करोए पहली शिकायत टीचरों के समय से स्कूल न पहुंचने की ही मिलती है। सरकारी स्कूलों के इसी रवैये से परेशान कुछ मां बाप गुणवत्तापरक शिक्षा के लिए बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ाने लगे हैं। मगर निजी स्कूलों की महंगी शिक्षा बुंदेलखंड में ज्यादातर लोगों के आर्थिक दायरे में नहीं है।
उसकी उम्र की दूसरी लड़कियों की तरह ही इशिता भी उत्साह से भरी थी। फेसबुकए वाट्सअप में चलने वाले ट्रेंडस और दोस्त उसकी जिंदगी का हिस्सा थे। लेकिन अब वह बांदा के बच्चों के भविष्य को गढ़ने में अहम भूमिका निभाने जा रही थी। लेकिन क्या वह उसके लिए तैयार थीघ् मेरी नजर में गलती इशिता की नहीं बल्कि गलती कमजोर शिक्षा व्यवस्था की है।