महिला पत्रकारों की कलम से… – बिहार में बढ़ी चुनावी बैचेनी

निवेदिता झा
निवेदिता झा

अब हर हफ्ते खबर लहरिया में पढ़ें महिला पत्रकारों की कुछ खास खबरें। राजनीति, विकास, संस्कृति, खेल आदि की ये खबरें देश के कोने-कोने से, छोटे-बड़े शहरों और अलग-अलग गांवों से हैं। इस हफ्ते, पढ़ें निवेदिता झा की खबर। निवेदिता बिहार राज्य की राजधानी पटना में कई सालों से रिपोर्टिंग कर रही हैं।

पटना, बिहार। बिहार में राजनीतिक दलों में बेचैनी दिख रही है। सबसे बड़ी बेचैनी है यह जानने की कि इस चुनाव में लोग क्या चाहते हैं? क्या ये चुनाव जाति के बलबूते लड़ा जा सकता है या विकास जैसे जुमले कारगर होंगे। नीतीश कुमार ने भाजपा को चुनौती देने और दलित, महादलितों के बीच अपनी पैठ बनाने के लिए जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाया। मगर इसका कुछ खास फायदा नहीं हुआ। उलटे मांझी मुसीबत बन गए। नीतीश जानते हैं कि यह चुनाव उनके और लालू प्रसाद के राजनीतिक भविष्य के लिए महत्त्वपूर्ण है। लालू प्रसाद के लिए यह मौका है अपनी राजनीतिक छवि सुधारने और जनता का भरोसा जीतने का। मौके की मांग को समझते हुए नीतीश और लालू ने हाथ मिला लिया है।

बिहार का दुर्भागय है कि लोगों की जि़न्दगी से जुड़े मसले से ज़्यादा बिहार में चुनाव का आधार जाति ही रही है। इस बार भी जाति के आधार पर पार्टियां अपनी चुनावी रणनीति तय कर रही हैं। लालू प्रसाद पिछड़ी बनान अगड़ी जातियों के लिए मंडल बनाम कमंडल का नारा दे रहे हैं वहीं भाजपा यह दावा कर रही है कि उसने देश का पहला ओ.बी.सी. प्रधानमंत्री दिया है। साल भर पहले भाजपा ने सबका साथ सबका विकास का नारा दिया था। मगर आज उसे बिहार में अपनी जाति तलाश करने के लिए कभी कर्पूरी ठाकुर जैसे मशहूर नेता का सहारा लेना पड़ रहा है तो कभी सम्राट अशोक की जाति खोजी जा रही है।

जाति की इस होड़ में सभी दल लगे हैं। जातिगत आधार पर हुए समाजिक आर्थिक जनगणना के आंकडे जारी करने की मांग तेज़ हो रही है। जातिगत जनगणना सिर्फ जातियों की राज्यवार संख्या ही नहीं बताएगी बल्कि यह भी पता चलेगा कि आज़ादी के इतने सालों बाद भी पिछड़ी जातियों की हालत क्या है। हालांकि नेताओं की चिंता में केवल चुनाव हैं। इसके चक्कर में वह सारी चालें चल रहे हैं। एक बार फिर बिहार की राजनीति में पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो गई है।
भाजपा ने लोकसभा चुनाव में भले ही अच्छा प्रदर्शन किया है पर उन्हें भी पता है कि बिहार में उनका जनाधार ऊंची मानी जानेवाली जातियों तक सीमित है। लोकसभा चुनाव जैसी जीत इस बार भी मिले यह ज़रुरी नहीं है। हो सकता है कि बिहार अपने नए समीकरण की ओर जाए।