महिला पत्रकारों की कलम से… – चुनावी दंगल में दमदार मुद्दा बना जाति जनगणना

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इस हफ्ते पढ़ें बिहार से खबर लहरिया के महिला पत्रकार नेटवर्क के विचार। बिहार में विधान सभा चुनाव इस साल होने वाले हैं। चुनाव के पहले चल रही राजनीति पर महिला पत्रकारों के विचार इस लेख में पढि़ए।

जनगणना की रिपोर्ट की चर्चा तो पूरे देश में है लेकिन बिहार में इस रिपोर्ट ने चुनावी दंगल में लड़नेे को तैयार दलों को एक गरमागरम मुद्दा दे दिया है। चुनाव के करीब होने की वजह से केंद्र की भारतीय जनता पार्टी ने जाति आधारित आंकड़ों को छिपाने की चालाकी की तो बिहार के स्थानीय दलों ने उनकी इस चालाकी को चुनावी मुद्दा बना लिया।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और राष्ट्रीय जनता दल के प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने एक सुर में जाति आधारित जनगणना के आंकड़े सामने लाने की मांग की है। लालू और नीतीश की चुनावी दोस्ती के माहौल में एक सुर होना कोई चैंकाने वाली बात नहीं। मगर यहां तो राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और नीतीश को फिलहाल सबसे बड़ा दुश्मन कहने वाले जीतन राम मांझी भी जाति आधारित जनगणना के आंकड़े चाहते हैं। यानी जाति-जनगणना के मुद्दे ने बिहार में विर¨धिय¨ं को एक कर दिया है। भाजपा के लिए यह मुद्दा मुश्किलें खड़ी कर सकता है। क्योंकि आज मांग एक हुई है। कल मांझी, लालू और नीतीश से हाथ भी मिला सकते हैं। वैसे राजनीति में दोस्ती और दुश्मनी मौके की ही होती है।

लालू और नीतीश ने कहा है कि अगर जाति आधारित आंकड़े नहीं जारी हुए तो वह बिहार में विरोध रैली करेंगे। इन लोगों का कहना है कि भाजपा जानती है कि गरीबी का स्तर सबसे ज्यादा दलितों, महादलितों और आदिवासी समुदाय में है। इसिलए वह नहीं चाहती कि आंकड़े सामने आएं और इनके लिए कुछ आर्थिक और सामाजिक सुविधाएं अलग से देनी पड़ें। क्योंकि ऐसा करने पर उसका परंपरागत वोट यानी ऊंची समझी जाने वाली जाति के लोग नाराज हो सकते हैं। दलित, और महादलित, अन्य पिछड़ा वर्ग और आदिवासी भाजपा की प्राथमिकता में ही नहीं है। दरअसल बिहार में दलित, महादलित और आदिवासी जनसंख्या पूरे जनसंख्या की करीब अट्ठारह प्रतिशत हैं। इसी गणित ने मांझी को बिहार की राजनीति में महत्वपूर्ण जगह दे दी है। अब भारतीय जनता पार्टी के लिए फिलहाल बिहार में जाति आधारित जनगणना गले की फांस बन गई है।