महिलाओं की तस्करी से निपटने के लिए “नया कानून”

Amalaराष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार, भारत में कुल तस्करी के 76 प्रतिशत मामले किशोरियों और औरतों की तस्करी के हैं. इन औरतों की सहायता करने के लिए सरकार ने मानव तस्करी (रोकथाम, संरक्षण और पुनर्वास) विधेयक, 2016 को पारित करने की पहल की है, हालांकि इस पर अभी तक केन्द्रीय संसद में चर्चा नहीं हुई है.

17 जून को वैकल्पिक कानून मंच (एयएलऍफ़) नामक वकीलों के एक समूह, जो सामाजिक और आर्थिक न्याय के मुद्दों पर काम करता है ने इस तस्करी के विधेयक पर एक चर्चा आयोजित की.

चर्चा के अनुसार इस नये विधेयक में समस्याएँ हैं…

  1. यह महसूस किया गया कि नये कानून को बनाने के बजाय तस्करी के खिलाफ मौजूदा कानूनों में सुधार लाना चाहिये.
  1. एय.एल.ऍफ़ के वकीलों ने बेंगलुरु के एक यौन कर्मी संगठन, साधना महिला संघ के सदस्यों से इस विधेयक पर बात की. उनका कहना था कि तस्करी पर कोई भी कानून, उनसे विचार-विमर्श किये बिना कैसे बन सकता है?
  1. विधेयक के धारा 4 के अनुसार, जिनको तस्करी से बचाया है उन्हें ज़िला तस्करी- विरोधी समिति के सदस्य सचिव के सामने लाना होगा. हालांकि यह लिखा नहीं है कि ये कब तक किया जाना चाहिए-24 घंटे के भीतर, एक सप्ताह के भीतर या एक वर्ष के भीतर?

तस्करी से सम्बंधित मौजूदा प्रक्रियाओं के अनुसार, ये काम 24 घंटे के भीतर हो जाना चाहिए, ताकि उन महिलाओं को अधिक वक़्त तक सरकारी सहायता घरों में ना रहना पड़े.

  1. विधेयक में मौजूदा लाभ तक पहुँचने के लिए एक रास्ता ही दिया गया है- महिला को एक सरकारी सहायता घर में भर्ती होना पड़ेगा. जो महिलाएँ ऐसे घरों में नहीं रहना चाहतीं उन्हें कोई सुविधा नहीं मिलेगी. हालांकि उच्चतम न्यायलय ने 2010 में आदेश दिया था कि तस्करी से जूझती महिलाओं को सरकारी घरों में रहने के लिये मजबूर नहीं किया जा सकता.
  1. साधना महिला संघ के सदस्यों को इस बात की भी चिंता है कि उनको उन्ही के ‘पुनर्वास’ में उनका कोई योगदान या विचार नहीं लिया गया है. विधेयक के धारा 8 और 9 के तहत उन्हें संरक्षण घरों में भेज दिया जायेगा. उच्चतम न्यायलय के अनुसार, ये घर किसी जेल से कम नहीं होते.
  2. इस विधेयक में सामाजिक पुनर्वास के कोई बात नहीं की गयी है. सामाजिक पुनर्वास बच्चों और यौन कर्मियों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि अक्सर उन्हें समाज में भेद-भाव सहन करना पड़ता है. जिसके कारण उनका परिवार उन्हें स्वीकार नहीं करता और उन्हें परिवार से संपत्ति भी नहीं मिलती.
  1. विधेयक के अनुसार, यौन कर्मियों के अलावा,तस्करी से जूझते सब लोगों को उनकी मजदूरी के पैसे, जो पहले नहीं मिले थे, सरकार की तरफ से मिलेंगे.

लेकिन विधेयक के बारे में एक अच्छी बात यह है कि धारा 12 के अनुसार जितनी ऐसी संस्थाएँ हैं जो लोगों को नौकरियाँ दिलवाने के दावे करती हैं उन्हें अपना पंजीकरण करवाना होगा. ये एक महत्वपूर्ण प्रावधान है क्योंकि ज़्यादातर तस्करी ऐसी संस्थाओं के माध्यम से ही होती है.