महिलाएं तय करेंगी बिहार नतीजे!

 

निवेदिता झा
निवेदिता झा

निवेदिता झा बिहार में काम करने वाली एक वरिष्ठ पत्रकार हैं । वह लगभगपिछले २५ सालों से राजनैतिक और सामाजिक मुद्दों पे पत्रकारिता कर रही हैं । 

पटना। बिहार के चुनाव में ऐसी क्या बात है कि देश भर की निगाह उस पर टिकी है? क्यों देश के प्रधानमंत्री को एक गरीब और पिछड़े राज्य में 30 चुनावी सभाओं को संबोधित करना पड़ता है, और करोड़ों रुपए चुनाव पर खर्च किए जा रहे हैं? ये सवाल हैं जो जनता के बीच हंै। आम आदमी के लिए मोदी, नीतीश और लालू की पार्टी के जीतने से ज़्यादा अहम सवाल है रोटी और दाल। वह देखना चाहता है कि विकास के सूचकांक पर नीचे लटके बिहार को लेकर किसको चिंता है? बिहार उन राज्यों में से है जहां गंगा-जमुनी तहज़ीब की गहरी पंरपरा रही है। आरएसएस की लगातार कोशिशों के बावजूद यहां उनकी जडं़े गहरी नहीं र्हुइं। बिहार का चुनाव इस बार मोदी बनाम महागठबंधन है। दिल्ली की पराजय के बाद यह माना जा रहा है कि मोदी का जादू टूट रहा है। बिहार मोदी के लिए असली परीक्षा है।
यह त्रासदी है कि इस बार का चुनाव भी जनता के मुद्दे पर नहीं लड़ा जा रहा है। भूख और गरीबी से जूझ रहे बिहार में जाति और धर्म को ही चुनावी मुद्दा बनाया गया। क्या यह संयोग है कि बिहार के चुनाव के ठीक पहले देश में गाय पर राजनीति शुरु हो गई। आरक्षण और अगड़े-पिछड़े जैसे सवाल उछाले गए। महिलाओं को नौकरी में आरक्षण देने से लेकर दलितों को रंगीन टीवी देने के वायदे किए गए हैं। ऐसे वादे शर्मनाक हैं।
अगले तीन चरण का चुनाव बिहार के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। पूरे देश की तरह बिहार का अनुभव यही है कि चुनाव के बाद वायदों को चुनावी जुमला कह कर खारिज कर दिया जाता है। बिहार में अब तक दो चरण चुनाव हो चुके हैं। दोनों चरण के चुनाव में महिलाओं की ज़बरदस्त भागीदारी से यह अनुमान है कि सरकार की जीत-हार में महिलाओं का वोट मायने रखेगा। राजनीति में महिलाओं को हाशिए पर धकेलने वाले सभी राजनीतिक दलों के लिए इस बार का बिहार विधान सभा का चुनाव सबक है। पुरुषों की तुलना में पांच प्रतिशत अधिक यानी 59.5 प्रतिशत महिलाओं ने मतदान किया।
राजनीति में तेज़ी से बदल रहे घटनाक्रम में बिहार में महिलाओं, मुसलमान और पिछड़ों व दलितों की भूमिका किसी भी पार्टी की जीत और हार के लिए निर्णायक हो सकती है। बिहार में महिला वोटरों की संख्या 3 करोड़ 11 लाख 77 हज़ार 619 है। लगभग डेढ़ करोड़ की आबादी मुसलमानों की है। राज्य की कई सीटें ऐसी हैं जिनका निर्णय मुस्लिम मतदाताओं के जि़म्मे है। बिहार के कुल मतदाताओं में पासवान जाति के मतदाताओं की कुल संख्या 6 फीसदी है। ऐसे में सभी पार्टियों के लिए उन्हें साथ लेकर चलने की मजबूरी और चुनौती दोनों हैं।
2009 की लोकसभा और 2010 की विधानसभा सीटों पर हुए चुनाव में महिलाओं की भूमिका अहम थी। नीतीश कुमार की ताजपोशी नहीं होती अगर दोनों चुनाव में महिलाओं ने जमकर वोट नहीं दिया होता।