भारत में माँ का स्वास्थ्य और घर की आर्थिक स्तिथि शिशुओं के अस्तित्व को निर्धारित करती हैं

नवीनतम राष्ट्रीय स्वास्थ्य डेटा के अनुसार, उन राज्यों में बच्चों की मृत्यु दर अधिक पाई गई जहाँ माताएं कम पढ़ी लिखी थी या अनपढ़ और गरीब थी। सर्वे के अनुसार, 5 वर्ष से कम उम्र के 58 फीसद से अधिक बच्चों में खून की कमी पाई गयी हैं। इसका मतलब है कि उनके खून में हीमोग्लोबिन की कमी है। जिसकी वजह से वे आसानी से संक्रमण की चपेट में जाते हैं और बीमार हो कर मृत्यु का शिकार बनते है। रिपोर्ट बताती हैं कि जिन बच्चों की माएं कम पढ़ीलिखी होती हैं वो बच्चे अपना बचपन भी नहीं देख पाते है। हालाँकि, शिशु मृत्यु दर (प्रति 1000 पर एक बच्चे की मौत) में कमी आई है। 1992-93 में शिशु मृत्यु दर 79 के मुकाबले घट कर 41 रह गई। ग्रामीण इलाकों की बात की जाए तो 1992-93 में शिशु मृत्यु दर 86 थी जो 2015-16 में घट कर 46 रह गई। 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर में भी कमी आई है। ग्रामीण भारत में यह दर 119 से घट कर 56 रही जबकि शहरी इलाकों में यह 75 से घट कर 52 रह गई। इसी प्रकार टीकाकरण के आंकड़े भी सकारात्मक हैं। शहरी भारत में 1से 2 वर्ष के बच्चों में सम्पूर्ण टीकाकरण के आंकड़ों में वृद्धि देखी गई। 2005-06 में टीकाकरण वाले बच्चों की संख्या 42 प्रतिशत ही थी जो 2015-16 में बढ़ कर 62 प्रतिशत हो गई। लेकिन इसका मुख्य कारण महिलाओं का शिक्षित होना है। सर्वे के अनुसार, पिछले सर्वेक्षण की तुलना में इन सभी ग्यारह राज्यों में महिला साक्षरता में 125 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है। गोवा 89 प्रतिशत साक्षरता दर के साथ महिला साक्षरता दर की सूची में सबसे ऊपर है। बता दें कि वर्ष 2015-16 के लिए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण– 4 (एनएफएचएस-4) में छह लाख परिवारों से सूचनाएं जुटायी गईं। उसमें सात लाख महिलाओं और 1.3 लाख पुरूषों पर अध्ययन किया गया। इस रिपोर्ट में 13 राज्यों के आंकडें शामिल हैंआंधप्रदेश, गोवा, बिहार, हरियाणा, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, मेघालय, सिक्कम, तमिलनाडु, तेलंगाना, त्रिपुरा, उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल के साथ केंद्रशासित प्रदेश अंडमान और निकोबार दीप तथा पुडुचेरी भी शामिल हैं।

फ़ोटो और लेख साभार: इंडियास्पेंड