भारत में टीबी की अधूरी जंग

देश में पांच में से एक मल्टी ड्रग रेसिस्टेंट टीबी का मरीज अपना इलाज बीच में छोड़ देता है, जिसका कारण सार्वजनिक क्षेत्र में जांच पड़ताल नहीं होना है। साथ ही इसका ये अर्थ भी है कि वे या तो इलाज शुरु नहीं करते या वे दो महीने से ज्यादा इलाज को छोड़ देते हैं। भारत में 2.8 मिलियन टीबी के मरीज हैं, जिनकी संख्य विश्व के टीबी मरीजों में चौथाई है।
देश में 147,000 मरीज मल्टी ड्रग रेसिस्टेंट टीबी के हैं, जिनका इलाज मुश्किल और महंगा भी है। 2015-16 में मल्टी ड्रग रेसिस्टेंट टीबी के मरीजों की संख्या में 13 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। वहीं 2014-15 के शुरुआती उपचार रजिस्टर के आंकड़ों के अनुसार 24,354 टीबी के मरीज में से 11,446 मरीजों ने अपना इलाज पूरा किया, इनमें से 7,796 मरीज स्वास्थ्य हुए और 3,563 ने इलाज पूरा किया। वहीं टीबी रिपोर्ट 2018 के अनुसार, देश में 4,873 मरीजों की मौत हुई, 4,697 मरीजों की जांच पड़ताल नहीं हुई, 562 का इलाज बीच में छूट गया और 2,863 टीबी के मरीज का टीबी एक्स्टेंसिवली ड्रग रेसिस्टेंट टीबी बन गया।
टीबी के 24 महीने वाले इलाज में मरीज को लगभग 14,600 गोली खानी पड़ी हैं, जिस कारण इसके दुष्परिणाम स्वरुप बेचैनी, उल्टी, चक्कर आने के साथ नज़र कम होना, किड़नी में खराबी, हेपेटाइटिस, अवसाद के साथ आत्महत्या जैसी बीमारियां के होने की सम्भावना बढ़ जाती हैं। इन परेशानियों को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 2016 में दो साल के इस इलाज को छोटा करके 9 महीने का कर दिया है। इस नई दवा का इलाज 2018 से देश में हो रहा है। इलाज के साथ सरकार मरीजों के खान-पान के लिए हर महीने 500 रुपये भी मरीज को देगी। पर ये कितना सफल होगा ये तो भविष्य भी बताएगा।

साभार:  इंडियास्पेंड