भारत में ग्रामीण ऋण,आपदा और मौत का संकट

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2015 में देश में 8,007 किसानों ने आत्महत्या की, जिनमें 10 में से 4 किसान कर्ज के बोझ में थे। 2014 में यह आंकड़ा 10 में से दो किसानों का था। 11 वर्षों में किसानों पर कर्ज का बोझ अधिक बढ़ा है और ग्रामीण परिवार ने 1.03 लाख रुपए उधार लिया था. ग्रामीण अर्थव्यवस्था में इस असफलता के कारण भारतीय जनता पार्टी ने ग्रामीण गुजरात में 16 सीटें गंवाईं हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम में बदलाव और किसानों की आत्महत्या की घटनाओं में वृद्धि हो रही है, जिसके कारण 2019 के आम चुनावों में ग्रामीण आर्थिक मंदी का एक महत्वपूर्ण मुद्दा एचओ सकता है। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने का का वादा किया था। जो होता नज़र नहीं आ रहा है।
2015 में 8,007 किसानों ने आत्महत्या की है, जोकि 2014 में 5,650 की संख्या में थी। 2014 में 20.6 % आत्महत्या करने वाले किसानों ने पैसे उधार लिए थे। 2013 में 3 किसान परिवारों में से 1 कर्ज में था। कर्ज से होने वाली आत्महत्याओं को देखे तो सबसे पहला स्थान महाराष्ट्र का है जहां 2015 में 1,293 ने आत्महत्या की। फिर कर्नाटक में 946 और तेलंगाना में 632 आत्महत्या के मामले हुए। 2018 में  कर्नाटक में चुनाव भी होने हैं। सीमान्त भूमि वाले किसान ज्यादा कर्ज में हैं, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और ओडिशा जैसे गरीब राज्यों में, 75 फीसदी से अधिक किसानों की सीमान्त भूमि वाले हिस्से कर्ज में हैं। किसानों को आज भी पारंपरिक तरीकों से कर्ज़ लेना पड़ता है, क्योंकि  बैंकों और अन्य एजेंसियों से कर्ज़ लेना कठिन है। 2013 में, 28.6 % किसानों ने पारंपरिक तरीकों से कर्ज़ लिया। वहीं ये संख्या 2002 में 19.6 % ज्यादा है।
जलवायु परिवर्तन के बढ़ने से ग्रामीण आय और फसल की पैदावर में कमी आई है। 2013 राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय के अनुसार भारत में औसत कृषि घर ने प्रति माह 6,500 रुपए से कम कमाया है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण फसल में खराबी आई है। फसलें जलवायु बदलाव के कारण खराब हुई है। जबकि बढ़ते मौसम के दौरान उच्च तापमान और कम बारिश ने आत्महत्याओं में योगदान दिया था। 1980 के बाद से भारत में आत्महत्या की दर दोगुनी हो गई है और आत्महत्याओं में वृद्धि में 6.8% हिस्सेदारी जलवायु परिवर्तन के कारण है।

लेख साभार: इंडियास्पेंड