भारतीय सिनेमा के सौ साल

 

(फोटो साभार - विकिपीडिया )
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भारतीय सिनेमा 3 मई 2013 को सौ साल का हो गया। समय के साथ मुद्दे बदले और फिल्मों को बनाने का तरीका  भी बदला। सोचो अगर फिल्मों से आवाज को निकाल दें तो कैसा लगेगा? गीत-संगीत बिना फिल्में कैसी लगेंगी? लेकिन जानकर अजीब लगता है कि फिल्मों की षुरुआत बिना आवाज के ही हुई थी। भारत की पहली फिल्म ‘राजा हरिषचंद्र’ 3 मई 1913 को पर्दे पर आयी थी। सिनेमा जगत की षुरुआत करने वाले दादा साहेब फाल्के ने इसे बनाया था। इस फिल्म में न तो आवाज थी न रंग और न हीं हीरोइनें। उस समय फिल्मों में औरतें काम नहीं करतीं थीं। औरतों की भूमिका भ पुरुश ही निभाते थे। सन 1930 तक बिना आवाज के ही फिल्में बनतीं रहीं। सन 1931 में बनीं फिल्म ‘आलम आरा’ में पहली बार लोगों ने आवाज वाली फिल्म के मजे लूटे। धीरे-धीरे फिल्मों में रंग  भी आए और हीरोईनें भी।

भारत के महान फिल्मकार ‘सत्यजीत रे’

(फोटो साभार - विकिपीडिया )
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भारतीय सिनेमा को दुनियाभर में पहचान दिलाने वाले सत्यजीत रे का जन्म 2 मई 1921  को हुआ था। इनकी पहली फिल्म पाथेर पांचाली दुनिया की सबसे अच्छी 50 फिल्मों में षामिल की गई है। ‘पाथेर पंचाली’ बंगाली में बनीं फिल्म थी। इसका हिंदी में मतलब है ‘सड़क के गीत’। पूरे 13 सप्ताह यही फिल्म टाकीज से नहीं उतरी। इसे 11 तरह के सम्मान दिए गए। जमींदारी प्रथा का विरोध करती इस फिल्म में एक परिवार की कहानी है जो जमींदार से अपना घर बचाने की कोषिष करता है।