भारतीय टेलीविजन की बहसों में महिलाओं की कम हिस्सेदारी

किसी भी शाम को लोग भारत के प्राइमटाइम टेलीविजन न्यूज़ बहस देखते हैं, तो उन्हें ये बात आसानी से समझ आ जाएगी कि महिलाओं की किसी भी विषय-राजनीति, अर्थव्यवस्था, शेयर बाजार या भू-राजनीति पर अपनी राय नहीं है। 5 फरवरी, 2018 से शुरू पांच दिनों के लिए इंडिया स्पेंड ने 8 से 10 बजे के बीच 10 अंग्रेजी समाचार चैनलों पर बहस पर टिप्पणीकार / प्रवक्ता / न्यूज़मेकर के रूप में दिखाई देने वाले पुरुषों और महिलाओं की संख्या की गणना की। महिलाओं की तुलना में पुरुष की संख्या चार गुना अधिक थी। 780 मिलियन टेलीविजन दर्शकों के साथ देश की प्राइमटाइम टीवी न्यूज पर पेशेवर महिलाओं की आवाज़ अनसुनी क्यों हैं। 7 बजे से शाम 10 बजे तक प्राइम टाइम माना जाता है
सीएनएन-न्यूज 18 पर पांच दिन के नमूने के अनुसार केवल 10 शो में एक महिला पैनल में थी। वहीं अर्बन गोस्वामी के शो ‘द डेबेट’ और टाइम्स के नाउ ‘द न्यूबोर’ में महिलाओं का सबसे कम प्रतिनिधित्व था।
टीवी की बहसों में महिलाएं विशेषज्ञों को पीड़ितों के रूप में ज्यादा दिखाया जाता है। 2015 में, भारत में मीडिया और लिंग पर पत्रकारों के एक इंटरनेशनल फेडरेशन के फैसले से पता चला कि केवल 6.34% उत्तरदाताओं का मानना ​​है कि समाचार कार्यक्रमों में महिलाओं को विशेषज्ञों और नेताओं के रूप में दर्शाया गया था, जबकि 21.73% ने कहा कि उन्हें पीड़ितों के रूप में चित्रित किया गया था।
7 बजे से शाम 10 बजे तक प्राइम टाइम माना जाता है। “पुरुष टीवी एंकर पुरुष कमेंटेटर के साथ लड़कों का क्लब बनाते हैं और वे स्वाभाविक रूप से उनसे अधिकतर मुद्दों पर बढ़ रहे होते है। भारत में टीवी न्यूज़ प्रबन्धकों के बीच एक विश्वास है कि समाचार दर्शक अधिकतर पुरुष हैं। वहीं महिलाओं को ज्यादातर लिंग मुद्दे पर चर्चा करने के लिए कहा जाता हैमहिलाओं के बोलने वाले मुद्दे आम तौर पर राजनीति, भू-राजनीति, रक्षा, वित्त या अर्थव्यवस्था की तुलना में लिंग पर अधिक बोलने वाले होते हैं। महिलाओं को ज्यादातर महिलाओं के मुद्दों पर टिप्पणियों के लिए संपर्क किया जाता है।
टीवी बहसों में महिलों का कम प्रतिशत पर एंकर कहते हैं, कि हम सर्वश्रेष्ठ विशेषज्ञों की तलाश करते हैं, लैंगिक संतुलन प्राथमिकता नहीं है।  साक्षात्कार में शामिल टेलीविजन एंकर कहते है, कि वे लिंग के बावजूद सर्वश्रेष्ठवक्ताओं की तलाश में हैं, और कहा कि व्यापार, वित्त और आर्थिक मुद्दों पर महिला विशेषज्ञों को पाने में मुश्किल है।

फोटो और लेख साभार: इंडियास्पेंड