बुंदेलखंड के ख़ास मौनी नाच के साथ आप भी थिरकिये इस दिवाली

16 अक्टूबर 2017 को प्रकाशित

जिला ललितपुर। बुन्देलखण्ड अपनी लोक संस्कृति और कला के लिए पूरे देश में प्रसिद्द है। चाहे वो आल्हा उदल की वीर गाथा हो,या प्रेम का प्रतीक कालिंजर किला वैसे ही है ललितपुर जिले का मौनी नाच। इसके पीछे की कहानी बड़ी ही दिलचस्प है। नारायण सिंह और लक्षमण सिंह का कहना है कि कारस देव बाबा की परम्परा गांव के लोग मानते हैं जिसमें लगभग बीस गांव के लोग शामिल होते हैं मौनी परम्परा में जो लोग मौन रहते है उनको मौनी बोलते है। मौनी नाच में लगभग तीस लोग भाग लेंते हैं और सुबह आठ बजे से रात आठ बजे तक मौनी नाच चलता है। गाय की बछिया के कान में फूंकते है तब कहीं जाकर लोगों का मौन खुलता हैं।लोग पूजा करतें हैं और प्रसाद बांटते हैं।

आनंदी ने बताया कि मौनी नाच  में लोग पुरखों की बनाई परम्परा को निभाते हुये अपनी ही धुन में नाचतें हैं।पीढ़ी दर पीढ़ी से  लोग इस परम्परा को निभा रहें हैं।

बाईलाइन-राजकुमारी