बांदा जिला बना हत्या का गढ़

दुःख मा डूबे गांव वाले
दुःख मा डूबे गांव वाले

बुन्देलखण्ड का जिला बांदा दुई साल से खुले आम हत्या करैं के मामला मा नाम कमाये जात है। सरे आम भीड़ के बीच दिन दहाड़े बेखौफ हत्या के घटना का अंजाम देब आम बात बन गे है। हत्या का दुख का घाव पूरैं नहीं पावत कि दूसर हत्या होई जात है।
बांदा जिला के चर्चित शब्बीर हत्या काण्ड, शानू हत्या काण्ड का घाव ताजा कई दिहिस बादल खां अउर पंकज शुक्ला हत्या काण्ड। बार-बार या सवाल उठत है कि आखिर बेखौफ, बेगैर डर के इनतान के अपराधी खुले आम कसत घूम सकत हैं? उनके भीतर पुलिस, कानून अउर सजा भोगैं का डर काहे निहाय? का पुलिस यतना सुस्त पर गे है कि घटना का अंजाम दें वाले अपने आप का कानून, पुलिस अउर जेल के ठेकेदार मानत हैं? शायद यहै कि पुलिस प्रशासन घटना होय के बाद ही जागत है।
अगर बादल खां पहिले से ही आपन सुरक्षा के मांग का लइके थाना, कोतवाली, सी.ओ., एस.पी. अउर डी.आई.जी. से गोहार लगावत फिरत ही रहत रहैं तौ पुलिस प्रसाशन या बात का गम्भीरता से काहे नहीं लिहिस? अगर पुलिस या मामला का गम्भीरता से लेत तौ दुई परिवार का बचावा जा सकत रहै। बादल खां का हत्या काण्ड या कउनौ पहली घटना न होय हर कइत इनतान के घटना का शोर रहि-रहि के महीना मा जरूर सुनै का मिलत है।
अब घटना होय के बाद पुलिस भला कुछ ठोस उपाय करी? जेहिसे कि इनतान के होय वाली घटना मा रोक लागै। घटना का अंजाम दें वालेन के जघा बाजार नहीं जेल होय? या फेर पुलिस इनतान के बार-बार अउर घटना होय का इंतजार करत रही?