बाँदा जिले की मशहूर लाई मंडी आज वीरान है..

जिला बांदा, कस्बा अतर्रा, 22 दिसम्बर 2016। मशीनों ने इंसान के काम को कम भी किया पर साथ में उनके हाथों से काम को छीनाभी है। जैसे बांदा जिले का अतर्रा कस्बा, जिसकी लाई के लिए सतना, मैहर, कानपुर, चित्रकूट और बांदा के बाजारों में बहुत मांग थी। पर आज का दृश्य कुछ और है – आज अतर्रा की लाई की 2 भट्टी हैं, जबकि 7 साल पहले यहाँ 120 भट्टियां थी। दुकानदार मशीन की भूनी लाई को ही खरीद रहे हैं, जिसका कारण दाम में सस्ता होना है, क्योंकि भट्टी की लाई कीमत में थोड़ी मंहगी पड़ती है।

35 साल का संजय वर्मा लाई भूनने का काम करतें हैं। वह भूनी लाई और मशीन की लाई का अन्तर समझाने के लिए अपने हर ग्राहक को दोनों लाई खाने को देते हैं, जिसके बाद ग्राहकों को दोनों को अन्तर समझ में भी आ जाता है। वह कहते हैं, “अभी भी मैं एक बोरी चावल की लाई रोज भूनता हूं और जो ग्राहक इस अन्तर को समझते हैं, वे इसे खरीदते भी हैं।”

वह इस लाई को बनाने का तरीका बताते हैं – कैसे धान को एक-दो दिन धूप में सुखाते हैं, फिर चावल बनाने के लिए चक्की में भेजते हैं, जिसके बाद इस तैयार चावल को भूनते हैं। इस काम में बहुत मेहनत लगती है। उनका मानना है कि मेहनत के कारण ही ये लाई खाने में इतनी स्वादिष्ट होती है।

भट्टी में बनी ये लाई अपनी सोंधी-सोंधी खुशबू के साथ खाने वाले के मुंह पर चढ़ जाती है, जिसका अन्तर आप मशीन और भट्टी की लाई खाकर समझ सकते हैं।

55 साल के जुगल किशोर भट्ट 13 सालों से लाई भूनने का काम करते हैं। आज धंधा नहीं चलने से वह बहुत परेशान हैं क्योंकि मेहनत के हिसाब से उन्हें पैसा नहीं मिलता है। वह कहते हैं, दूकानदार इसे मंहगा कहते हुए मशीन की लाई को खरीदते हैं।

पिछले सात सालों में यहां की 120 भट्टियां की संख्या बन्द होकर 2 भट्टियों में बदल गई हैं और यहां के लोगों ने अन्य रोज़गार अपना लिए हैं। पर इस लाई का अन्तर समझने वाले स्थानीय लोग अभी भी यहीं की लाई खरीदते हैं। आपको बताते चलें कि वैसे तो यहां लाई हमेशा ही बनती है पर सर्दी के मौसम में इस भूनी लाई से लाई के लड्डू और पट्टी भी बनती है।

रिपोर्टर- मीरा देवी और गीता

16/12/2016 को प्रकाशित