बनारस में घटते बुनकर

BUNKAR

जिला -वाराणसी, ब्लाक-काशी विद्यापीठ, अराजीलाइन, चिरईगांव, चोलापुर। बनारसी साड़ी के लिए मषहूर बनारस में बुनकरों की अच्छी खासी आबादी है। बनारसी साड़ी न केवल बनारस की पहचान है बल्कि बुनकरों की रोजी रोटी का भी जरिया है। लेकिन दुनियाभर में लोकप्रिय बनारस की साड़ी को बनाने वाले बुनकर अपना पुष्तैनी काम धंधा छोड़ने को मजबूर हैं। इससे भी ज्यादा चिंता वाली बात यह है कि अब ये बुनकर अपनी नई पीढ़ी को इस धंधे से दूर ही रखना चाहते हैं। आंकड़े भी यही कहते हैं, 1992 से लेकर 2007 तक करीब 60 प्रतिषत बुनकर इस काम को छोड़कर दूसरे काम से जुड़ चुके हैं। बुनकरों की संख्या लगातार कम होती जा रही।
आराजीलाइन ब्लाक के गांव मेहदीगंज के करीब 28 साल के राजू हाथ की बुनाई का काम करते हैं। अपने बाप से इस हुनर को सीखने वाले राजू इस धंधे को छोड़कर केरल जाने की तैयारी कर रहे हैं। उन्होंने बताया जब से होष संभाला इस धंधे से जुड़ा हूं। मेरे पिता भी यही काम करते थे। लेकिन अब इस धंधे से घर की रोटी चलाना भी कठिन हो गया है। पूरा दो दिन खपाने के बाद एक साड़ी बनकर तैयार होती है। बाजार में हजारों में बिकने वाली इस साड़ी का हमें केवल 250 रुपया ही मिलता है। चोलापुर ब्लाक के मोवइयां गांव के मुस्लिम बस्ती के रमजान, साहिल, मोहम्मद अंसार समेत और कई बुनकरों का कहना है कि हम लोग ये काम पीढ़ियों से कर रहे हैं। दूसरा कोई हुनर आता भी नहीं। इसे छोड़ा तो मजदूरी या फिर रिक्शा, आटो ही चलाना पड़ेगा। कुछ ऐसा ही हाल है काषी विद्यापीठ ब्लाक की महमूदपुर सुरहीं बस्ती के बुनकरों का भी। सुरहीं के रामजी मौर्या, बैजनाथ और महमूदपुर के मुश्ताक, सरवर, शमषेर का कहना है कि सरकारी योजनाएं बस नाम के लिए हैं। बड़े स्तर पर बुनकरी उद्योग से जुड़े लोगों को ही इसका फायदा मिलता है। लेकिन जिन बुनकरों को वाकई में जरूरत है, उन्हें इसका कोई फायदा नहीं मिलता है।
बुनकरों की इस समस्या के बारे में बुनकर विभाग के सहायक निदेषक तपन शर्मा का कहना है कि बुनकरों के लिए तो सरकारी योजना है। जिसके तहत बुनकर कार्ड पर लोन भी दिया जाता है। इस कार्ड पर बुनकरों को 4000 का सामान 3600 में दिया जाता है। बुनकरों के लिए सरकार की और भी योजनाएं हैं- जैसे बुनकरों की रंगाई सस्ते दामो में हो, उन्हें सस्ते दाम में रेषम भी उपलब्ध कराया जाता है। जिन बुनकरों को इन योजनाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है उन्हें विभाग में आकर इसके बारे में बात करनी चाहिए।