बदहाल बांदा पोस्टमार्टम हाउस

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विष्णु त्रिपाठी फार्माशिष्ट बताते हैं कि आठ सालों से इन्हीं हालात में हम ड्यूटी कर रहे हैं पीने का पानी घर से लाते हैं। बदबू भगाने के लिए अगरबत्ती जलाते हैं।

बांदा। यहां के पोस्टमार्टम हाउस में न पानी है न छाया। गंदगी इतनी ज़्यादा है कि कोई पल भर खड़ा नहीं रह सकता है। यहां का स्टाफ और पोस्टमार्टम करवाने आए लोग यहां दिन भर गुजारते हैं। पूरे बांदा में एक ही पोस्टमार्टम हाउस है। स्टाफ में तीन लोग हैं।
22 मई 2014 में महुआ ब्लाक के खम्भौरा गांव के रहने वाले एक परिवार के चार लोग एक्सीडेंट में मारे गए थे। चारों लाशों का पोस्टमार्टम करवाने 23 मई 2014 में परिवार के लोग आए थे। पूछने पर बाहर खड़े परिवार के ही लोगों में से राम सनेही और पिंकी ने बताया कि हम लोग सुबह से यहां धूप में बैठे हैं। यहां हैण्डपम्प भी नहीं है। एक किलोमीटर दूर जाकर पानी का पाउच लाना पड़ता है। गंदगी इतनी ज्यादा है कि उबकाई आ जाए। बांदा निवासी एम्बुलेंस के ड्राईवर गजराज सिंह और कल्लू ने बताया कि हमको पोस्टमार्टम हाउस में दिनभर गुज़ारना पड़ता है। यहां पर 72 घण्टों तक सड़ी लाशें बिना डी. डी. टी. छिड़काव के रखी रहती हैं।

सी. एम. ओ. बांदा डाक्टर कैप्टन आर के सिंह का कहना है खराब हैंडपंप बनवा दिया जाएगा। छाया के लिए पेड़ हैं जिस तरह का पोस्टमार्टम हाउस होना चाहिए उस तरह का है। रही बात साफ सफाई की तो कीटनाशक दवा का छिड़काव कराया जाएगा।