बदलते बाज़ार , मुश्किल में ललितपुर के मूर्तिकार

ललितपुर में बन रइ मूर्ति अबे दुर्गा पूजा के लाने तो कबहु सरस्वती पूजा के लाने सरस्वती जी कि मूर्ति बनात।
भगवत ने बताई के हमाय संगे दो आदमी और काम करत। और हम जो काम दस साल से कर रए ओर जो काम मिलके करत जो फायदा होत सो बराबर बराबर लेत। लेकिन हम ओरन को जा में कम फायदा मिलत।
हरेन्द्र ने बताई के पांच हजार के बांस लेयात रेंज से और सब सामान लेयात। हमाओ अस्सी प्रतिशत रुपईया खर्च हो जात बीस प्रतिशत कि हमे फायदा होत। और जो सांचे से बनात बे एक दिन में चार पांच बना लेत और हम चार पांच दिना में एक मूर्ति तैयार कर पात। और फिर बई हिसाब से बैचत पन्द्रह सौ कि एक मूर्ति बिकत। काय के सांचे से बनी मूर्ती के ज्यादा दाम मिलत। और हाथ से बनी मूर्ति के कम दाम मिलत हम ओरन को तो बेचने हे सो दे देत काय के नौ दुर्गान में बिकने एक दिना बिकती और जो ऑर्डर करके बनबात बे सांचे से बनवात बस फिर बाद में धरी रती सो हमे तो जितने दाम मिलत सो बेच देत। हम पन्द्रह सौ कि एक मूर्ति बैचत बे दस बारा हजार कि एक मूर्ति बैचत। और उने बनाबे में ज्यादा टेम नई लगत हमे जयादा टेम लगत काय के पेले हम बांस कसत फिर बा पे कास लगा के बाय पूरो रस्सी से बाधत फिर बके बाद कछु करत और इतनो करबे में तो हमे दो दिना लग जात बाके बाद फिर मट्टी को काम करत। और हम दो आदमी हे सो दोई जने बनात ज्यादा जासे नई लगाय के जब फायदा होबे तो लगाबे। जब हमई को बीस प्रतिशत कि फायदा मिलत तो हम दोई जाने आदे आदे बंाटत फिर बाय का से देहे और बाय देदे तो हम ओरन को का बच हे।
के एस राजपूत ने बताई के जे मूर्तियन में फायदा नई मिलत जादा काय के इने बनाबे में टैम भोत लगत और दाम इनके कम मिलत। अब सांचे से बनी मूर्तियों कि ज्यादा मांग हे ।

रिपोर्टर- राजकुमारी  

 

18/08/2016 को प्रकाशित