बढ़त हिंसा जिम्मेदार के?

फैजाबाद अम्बेडकर नगर कै बात कीन जाए चाहे पूरे उत्तर प्रदेष कै। महिलन के साथे हिंसा दिन प्रतिदिन बढ़त जात बाय। सरकार के यतना कानून बनावै के बावजूद कउनौ असर नाय पड़त बाय।
लड़की, महिला कै अपहरण, बलात्कार हुवय या दहेज के ताई जलावै कै कारण। हर रोज सुनै मा आवाथै कि आज ई घटना घटिगै। लकिन घटना कै हल सालन बीत जाए के बादौ नाय निकलत। हिंआ तक कि पुलिस प्रषासन ई नाय पता लगाय पावत कि आरोपी के बाय। नामजद रिपोर्ट दर्ज करावै के बावजूद न्याय नाय मिलत। एक तरफ महिला हिंसा रोकै के ताई सरकार नया नया नियम लगावत बाय। वहीं दुसरी तरफ प्रतिदिन हिंसा बढ़त जात बाय। यतना कड़ा रुख अपनावै का चाही कि गलत काम करै से पहले मनई सौ बार सोंचै।
सड़क पै के कहै घरमा महिला लड़की सुरक्षित नाय बाटिन। जब अपने खुद के घरमा यतनी असुरक्षा बाय तौ घर से बाहर कैसे निकल सकाथिन। कहा जाथै कि समाज बदलत बाय मनइन कै सोंच बदलत बाय। लकिन यहि बदलत समाज मा महिला हिंसा नाय कम भै। एक तरफ जगह जगह मनई धरना पै बैठके न्यान कै लड़ाई लड़ाथिन। दुसरी तरफ उनहीं भक्षक बन जाथिन।
हर दिन कै अगर आंकड़ा निकाला जाए तौ पचीस प्रतिषत मेहरारु रोज हिंसा कै षिकार हुवत अहैं। चाहे ऊ मानसिक हिंसा हुवय या षारीरिक। यतनी हिंसा बढ़ै के बावजूद सरकार कउनौ कड़ा रुख काहे नाय अपनावत? अगर षासन प्रषासन कड़ाई कै पालन करैं तौ मनइन का जल्द से जल्द न्याय मिल जाए। अउर षायद यतनी हिंसा न बढ़ै?