बज उठा 2017 यूपी चुनाव का बिगुल

UP govermentअभी नया साल आए एक हफ्ता ही हुआ है और उत्तर प्रदेश में चुनाव की तैयारियां शुरू भी हो गई हैं। राजनीतिक यात्राओं और वादों का मौसम एक बार फिर आ गया है। राजनीतिक दलों ने 2014 में हुए आम चुनावों बाद सबसे ज़्यादा महत्त्वपूर्ण इन चुनावो की नींव रखनी शुरू कर दी है।

मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने, जो 2012 में चुनाव अभियान का मुख्य चेहरा थे, मतदाताओं को रिझाने के लिए कोशिशें शुरू कर दी हैं। समाजवादी पार्टी द्वारा ‘कष्टमय जि़लों’ की सूची बनाई गई है जिनके लिए ‘जिला प्रभारी’ नियुक्त किया गया है। राजनीतिक दाल द्वारा एक महत्वकांशी यात्रा भी शुरू की गई है – ‘गाँव गाँव अखिलेश’। शहरी मतदाताओं के लिए अखिलेश यादव आशा कर रहे हैं कि ‘प्रवासी दिवस’ जैसे बड़े शो विकास की बात करके उन्हें प्रभावित करेंगे।
15 जनवरी को उनके जन्मदिन तक मायावती दल के कार्यकर्ताओं को सब जि़लों से पास ला रही हैं ताकि एक रणनीति बनाई जा सके जिससे मुस्लिम-दलित वोट दोबारा साथ आ सकें। क्या विरोधी लहर और समाजवादी पार्टी द्वारा किया जा रहा बुरा शासन मायावती के वापस आने का कारण बनेगा?
कांग्रेस में भी जान आने की निशानियां दिखाई दे रही हैं। इस महीने राहुल गांधी बुंदेलखंड आने वाले हैं जिसके लिए पहले से ही कांग्रेस नेता यहां के सूखाग्रस्त जि़लों का चक्कर लगाने लगे हैं। राहुल गांधी के भट्टा पारसौल यात्रा  जैसे ही जिससे उनका किसानों, ट्राइबलों और गरीबों की ओर अपनापन दर्शा था। उनके बुंदेलखंड जाने से कार्यक्रम की शुरुआत हो सकती है।
भारतीय जनता पार्टी हमेशा की तरह अपना बड़े-बड़े शब्दों से भरा अभियान ही चला रही है। प्रधानमंत्री समेत बड़े-बड़े नेताओं को राज्य के कोने कोने में ले जा रही है।
देखते हैं कि सभी दलों के लिए क्या बाज़ी पर लगा है। भारतीय जनता पार्टी के लिए 2019 के आम चुनावों से पहले ये सबसे महत्त्वपूर्ण चुनाव होगा। उनका पूर्ण बहुमत खासतौर पर उत्तर प्रदेश के कारण ही है जहां से उन्हें 70 संसदीय सीटें मिली हुई हैं। बिहार में हार के बाद उत्तर प्रदेश में हार ‘मोदी लहर’ के लिए अंतिम प्रहार साबित हो सकती है। मायावती के लिए हार का मतलब होगा कि राजनीतिक रूप से वे क्षीण हो गई हैं। कांग्रेस का पुर्नजागरण और राहुल का राजनीतिक रूप से बचा रहना राज्य में उनके प्रदर्शन पर निर्भर करेगा। अखिलेश के लिए ये उनके राजनीति के निजी ब्रांड की परीक्षा है। ये देखना बाकि है कि बाकि का यादव परिवार उन्हें दबा देता है या वो समाजवादी पार्टी का चुनावी भाग्य लिखते हैं।
क्या हम ये कह सकते हैं कि अब 2017 दूर नहीं? सारी नज़रें उत्तर प्रदेश पर हैं।