फील्ड में नहीं दफ्तर में डर लगता है

कैसी खबरें आपको करने में मज़ा आता है?
जो खबरें कुछ नया कहती हैं, जैसे – महिला ड्राइवर की कहानी, जेल के भीतर की कई कहानियां, ऐसे बच्चों की बातें जो जेल में ही पैदा होते हैं, उनकी भी कहानियों को मैंने रिपोर्ट किया। मैंने कई घोटालों के बारे में भी रिपोर्टिंग की है।

साथी पुरुष पत्रकारों का रवैया आपके प्रति कैसा रहता है?
हमें दफ्तर जाना नहीं पड़ता। यहीं से खबरें की और भेज दीं। पर दफ्तर का अनुभव मेरा काफी खराब हैै। मैंने हिंदी के एक बड़े अखबार काम किया था। खूब खबरें कीं। छपी भीं। जैसे-जैसे मेरा नाम होने लगा। मुझे हाशिए में ढकेलने की कोशिश होने लगी। मैं क्राइम की खबरें भी लाती थी। वहां के क्राइम रिपोर्टर को यह बात अच्छी नहीं लगी। उन्होंने मुझे धमकाया। एक दिन तो टेलीफोन फेंककर मारा भी, अधिकारी के सामने। मेरी कुर्सी तक दफ्तर से बाहर रखवा दी गई थी।

रिपोर्टिंग के दौरान कभी खतरे का सामना करना पड़ा ?
हां एक बार मुझे याद है कि एक स्थानीय नेता मारा गया था। उस पर खबर कवर करने सारे पत्रकार गए थे। पहले ही हमसे कह दिया गया था, कि अगर कोई खतरा दिखे तो ऊपर से कूद जाना। मैं दो मंजि़ला ऊंची इमारत पर थी। एकदम से भगदड़ मची और मैं कूद गई। उसका असर इतना ज़्यादा पड़ा था कि मैं महीनों बाहर नहीं निकली थी।

अमृता कुमारी
जि़ला समस्तीपुर, राज्य बिहार