प्रिय रक्षा मंत्री जी, भारत की मुसल्मान आबादी, देश की दुश्मन नहीं: मशहूर एक्टिविस्ट फ़राह नाक्वी का बयां  

साभार: फ़राह नाक्वी/ द वायर

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के मुस्लिम बुद्धिजीवियों मुलाक़ात पर भाजपा पार्टी के तो समझो होशो-हवास उड़ गए हो! ‘चुनावी रणनीति’ से लेकर ‘बटवारे’ के आरोप राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी पर लगाए गए। हम लोग, जो इस चर्चा में शामिल थे, हमारे लिए ये एक बड़ी अजीब बात थी। देश के कार्यकर्ताओं से बात चीत करना हम जैसे विशेषज्ञों के लिए आम बात है, और किसी भी लोकतंत्र के बेहतरीन चालान के लिए ज़रूरी।

लेकिन भाजपा इस मुलाकात पर अपने 2019 चुनावी हथकंडे आज़माने से बाज़ नहीं आई। यहां तक की रक्षा मंत्री निर्मला सीथारमण ने जिस तरह शब्दों का प्रयोग किया – मुस्लिम बुद्धिजीवियों – उन्होंने एक समुदाय के प्रति अपनी भावनाओं का ख़ास खुलासा कर दिया। मंत्रीजी को अपनी राय रखने का पूरा हक़ है, और कांग्रेस पार्टी की आलोचना करने की भी। लेकिन उन्होंने जिस तरह से प्रेस कॉनफेरेन्स बुलाकर, ये घोषणा की, की इस तरह की चर्चा का मतलब यक़ीनन कोई षड़यंत्र है, वो बहुत ही शर्मनाक बात है।

अगर राहुल गांधी या मीटिंग में मौजूद किसी भी व्यक्ति द्वारा कांग्रेस को ‘मुस्लिम पार्टी’ कहे जाने की फेक न्यूज़ को भूल भी जाएं तो यह सोचना दिलचस्प होगा कि क्या  सीथारमण सच में यह मानती हैं कि किसीऐसे देश में जहां 86 फीसदी आबादी गैर-मुस्लिमों की है, वहां ऐसी किसी पार्टी का कोई लोकतांत्रिक भविष्य हो सकता है बजाय इसके मैं यह जानना चाहती हूं कि क्यों कोई नेता- भले ही किसी भी पार्टी का हो- किसी सामान्य मुस्लिम नागरिक सेनहीं मिल सकता, जिसके मन में कुछवाजिब सवाल हों। या फिर भाजपा कहना चाहती है कि पार्टियों को मुस्लिमों के नाम पर केवल तीन तलाक़ पीड़ित मुस्लिम महिलाओं से मिलना चाहिए।भाजपा की बहस क्या है? क्या लोकतांत्रिक भारत मेंअल्पसंख्यक अधिकारों पर बात नहीं कर सकते? क्या केवल मुस्लिम नाम के लोगों के मौजूद होने से ये सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का मामला बन जाता है? क्या एक ही मुस्लिम होता तो ठीक था? 11 लोग ज्यादा होते हैं? मैं समझ नहीं पा रही हूं किचल क्या रहा है?

अगर मंत्री महोदय ने थोड़े भी तथ्य जांचे होते तो उन्हें यह पता चल जाता कि यह बैठक पूरे भारत को लेकर एक समावेशीय नज़रिए के बारे में थी, जहां सभी के लिए न्याय और विकास की बात की गयी।समानता और समान नागरिकता का भारत।ऐसा भारत जहां हत्यारों और लिंचिंग करने वालों को हार्वर्ड से पढ़े मंत्री फूलमालाएं न पहनाते हों। हमने संविधान को लेकर बात की।हमने ऐसे ढेरों धर्मनिरपेक्ष मुद्दों, जैसे शिक्षा, रोज़गार, गरीबी और गैरसंगठित क्षेत्र पर बुरी तरह लागू किए गयेजीएसटी और नोटबंदी के प्रभाव, जिससे देश के मुस्लिम और हाशिये पर पड़े समूह दो-चार हो रहे हैं, पर की बात की।न कोई वादा मांगा गया न किया गया।’

हम में से कई ने भारत के सबसे कमजोर नागरिकों को आज महसूस करते हुए कितनी तेजी से डरते हुए बात की। सरकार ने भारत में स्वतंत्रता और लोकतंत्र के लिए भारी नुकसान के कारण किया है।
इसने खुली बोली को शांत कर दिया है, अकादमिक संस्थानों पर हमला किया है, स्वतंत्र सोचने वाले छात्रों पर राजद्रोह के आरोपों को थप्पड़ मार दिया है, महिलाओं के खिलाफ हिंसा रोकने में नाकाम रहे हैं, नम्र मवेशी व्यापारियों के आंदोलन को रोक दिया है, और अपने नागरिकों के खिलाफ सबसे अजीब तरह की हिंसा को बढ़ावा दिया और प्रोत्साहित किया – ज्यादातर मुस्लिम , और दलित, और अब भयावह और जनजातियों के लोग, (जैसे हाल ही धुले, महाराष्ट्र में देखने को मिला)।  इस शासन ने सभी भारतीयों पर दवाओं से भरे उच्चतंत्र को उजागर किया है। और मैं किसी भी राजनेता या नीति निर्माता के निमंत्रण को इन चिंताओं के बारे में बात करने के लिए स्वीकार करूंगा, भले ही मुसस्लिम नाम रखने का तथ्य माननीय रक्षा मंत्री को इस तरह के ग़लत मनोदशा में रखे।

फ़राह नाक्वी दिल्ली में रहने वाली  एक मशहूर एक्टिविस्ट हैं । ये लेख द वायर में प्रकाशित लेख का हिंदी अनुवाद है।