प्रजनन में समस्या के कारण और उनसे जुड़ा सामाजिक तनाव

आधुनिक जीवनशैली और खान-पान में लापरवाही ‘पॉलीसिस्टिक अंडाशय सिंड्रोम’ यानी पीसीओ से ग्रसित बना रही है। अगर समय रहते इसका इलाज नहीं किया जाए तो ये महिलाओं में मां बनने की क्षमता से वंचित कर सकती है।

हालांकि प्रजनन की एक उम्र मानी जाती है, पर ये बीमारी छोटी उम्र की लड़कियों में देखी जा रही है। एक अनुमान के अनुसार हर दस में से एक लड़की इससे पीड़ित है।पीसीओ को सरल भाषा में समझा जाए तो ये अंडाशय के अंदर बहुत सारे अल्सर का पाया जाना है। इसके लक्षणों में वजन का बढ़ना, गर्दन और शरीर में धब्बे पड़ना, मासिकधर्म में अनियमितता, अनचाहे बालों का आना और मुंहासे का होना है। इसका एक मुख्य कारण हार्मोंन का असंतुलन है।

फोटो साभार: इंडियास्पेंड

 

इसके लक्षणों को देखते हुए इसका ठीक समय में इलाज करना बहुत जरुरी है, क्योंकि ये प्रजनन की क्षमता को भी प्रभावित करता है। सही समय में इसका इलाज और स्वस्थ भोजन और समाज का साथ इसके लिए बहुत जरुरी है।

इस बीमारी का दुष्परिणाम शारीरिक ही नहीं हैं, बल्कि महिलाओं में मानसिक दबाव भी बढ़ा रहा है। पीसीओएस गूगल पर लिखने पर आप महिलाओं की हताशा देख सकते हैं, साथ ही उनमें अकेले पड़ने और उनके महत्वहीन होने के डर को भी दिखाता है। महिलाओं की तरह नहीं दिखना इन महिलाओं के आत्मसम्मान को बुरी तरह खत्म कर देता है। आपकों बता दें कि इस बीमारी के कारण महिलाओं के चेहरें में बाल की मात्रा अधिक हो जाती है।

क्या है ‘पॉलीसिस्टिक अंडाशय सिंड्रोम’?

महिलाओं पर किए एक सर्वेक्षण में ये बातें सामने आई कि चेहरे में बाल में वृद्धि, सिर पर बालों की कमी के कारण वे असहज महसूस करती हैं, जबकि कुछ ने कहा कि उन्हें इस कारण से स्कूल में तंग भी किया था। अत्यधिक बाल उगना के कारण वे शर्म महसूस करती हैं और इसका कॉस्मेटिक समाधान कराये तो वे बेहद महंगा हैं। अब अगर इसके इलाज की बात करें तो अधिकतर महिलाओं ने पीसीओएस का इलाज इसलिए किया, क्योंकि उन्हें प्रजनन क्षमता खत्म होने का डर था। गर्भनिरोधक गोलियों के दुष्प्रभावों में से एक पीसीओएस है। डॉक्टर भी इन दवाओं के प्रयोग के समय इसके दुष्प्रभावों का उल्लेख नहीं करता है। एक खोज में पाया गया हैकी23.5 प्रतिशत डॉक्टरों ने दवा, इंसुलिन प्रतिरोध और व्यायाम को इलाज में लिया, जबकि 22.2 प्रतिशत ने सिर्फ दवा को इजाल में लिया। पीसीओएस को इलाज के साथ एक स्वस्थ जीवनशैली से कम कर सकते हैं।

डॉक्टरों का इस बीमारी के बारे में मरीज को अधिक जानकारी नहीं बताना भी महिलाओं के डर को बढ़ाने में जिम्मेदार है।

लेख साभार: इंडियास्पेंड