प्यार जो समाज समझ नहीं पाया, जानिये ये अमर प्रेम कहानी बाँदा के भूरागढ़ मेले में

जिला बांदा, 19 जनवरी 2017। मकर संक्रांति को हर क्षेत्र के लोग अलग-अलग तरह से मनाते हैं। कहीं तिल और गुड़ की खाद्य वस्तुएं बनती हैं, तो कहीं पतंग और खिचड़ी खाकर लोग इस त्योहार को मनाते हैं। पर बांदा के भूरागढ़ किले में हर साल मकर संक्रांति के दिन एक भव्य मेले का आयोजन होता है। बांदा वासियों का  कहना है, “ये प्यार करने वालों का मेला है और इस दिन कोई प्यार करने वाला जोड़ा भूरागढ़ किले की दीवार में अपना नाम लिखता है, तो उनका प्यार और गहरा हो जाता है।” हर साल लगने वाले इस मेले में 15 हजार तक लोग बांदा, बटोन, और कबरई से आते हैं।

केन नदी के किनारे लगने वाले भूरागढ किले मेले के पीछे की प्रचलित कहानी ये हैं कि भूरागढ़ किले के राजा की लड़की को एक नट से प्यार था। दोनों एक दूसरे से शादी भी करना चाहते थे। पर राजा ने उनकी शादी करने से पहले एक र्त रखी कि यदि वह नट केन नदी के दूसरी तरह के बॉम्बेश्वर पहाड़ से किले में रस्सी बंधकर उस रस्सी के द्वारा किले में आये। नट ने राजा की बात के अनुसार रस्सी बांध दी पर जब वह नदी को पार कर रहा था, तो राजा ने बेईमानी करते हुए उसकी रस्सी कट दी, जिससे नट की रस्सी से गिरने से मौत हो गई। नट की मौत की खबर सुनने के बाद राजा की बेटी ने भी अपनी जान दे दी और दोनों की समाधी पर किले के पास एक मंदिर बना दिया।

आज इस मेले में प्यार करने वाले लोग आते हैं और किले की दीवारों में अपने नाम लिखते हैं। लाखों नामों से सजी इस किले की दीवारे हर प्यार करने वाले के जुनून को बया करती है। इस मेले में आने वाले हर इंसान को उसकी जरुरत का सामान जैसे घर का सामान, खिलौने, कपड़े, खाने- पीने और श्रृंगार के सामान मिलते   हैं। 8 साल से इस मेले में बच्चों के खिलौनों की दूकान चलाने वाले अनिल कहते हैं, “इस मेले में मेरी अच्छी कमाई हो रही है।” वहीं मेले देखने आई रामप्यारी नट बाबा के मंदिर में प्रसाद चढ़कर मेले देखने की शुरुआत हर साल करती हैं। इस मेले में बुंदेलखंड के लोकनृत्य देवरी नाच और मौनी नाच का भी आयोजन होता है।

रिपोर्टर- गीता

16/01/2017 को प्रकाशित