पास और फेल का खौफ

साभार: लेट गर्ल्स लर्न

पिछले दिनों मानव संसाधन विकास मंत्रालय से जुड़ी संसदीय स्थायी समिति ने सररकार को नो डिटेंशन पॉलिसी यानि कक्षा 8 तक के बच्चों को फेल नहीं करने की नीति को हटाने की सिफारिश की है। समिति ने कहा कि नो डिटेंशन पॉलिसी से न छात्र पर सीखने का कोई दबाव रहता है और न शिक्षकों पर सिखाने का कोई दबाव होता है, ऐसे में नीति में बदलाव करने की जरुरत है ताकि प्राथमिक शिक्षा के दौरान छात्र की शैक्षिक कौशल बेहतर बनाया जा सके।

नो डिटेंशन पॉलिसी को शिक्षा का अधिकार 2009 में लाया गया। जिसके बाद 8वी कक्षा तक स्कूलों में बच्चों को फेल नहीं किया जाएगा। इसके स्थान पर बच्चे की साल भर का प्रदर्शन देखा जाता था, जिस कारण से बच्चों पर से पास फेल का डर दूर किया जाता था और बीच में पढ़ाई छोड़ने वाले बच्चों का प्रतिशत भी कम किया गया।

हालांकि पढ़ाई के लिए दबाव कम होगा। लेकिन सीबीएसई के कुछ सालों के परीक्षाफल से ये बात साबित हो जाती है, 2009 में सीबीएसई के 10वीं में पास होने वाले बच्चों का 98 प्रतिशत था। वहीं 2012 में जब नो डिटेंशन पॉलिसी को लगे तीन हो गए थे तब सीबीएसई में 10वीं में परीक्षाफल 98 प्रतिशत हो गया। साथ ही देश के 23 राज्यों ने स्कूलों में 5वी और 8वीं में फेल नहीं करने की नीति में संशोधन करने का समर्थन किया है और आठ राज्यों ने इस नीति को पूरी तरह से वापस लेने का पक्ष लिया है।

इस नीति ने पढ़ाई लिखाई का भूत जैसा खौफ कम किया है, और कोई भी नहीं चाहता कि बचपन एक खौफ के बीच गुजारे। वैसे भी देश की शिक्षा व्यवस्था समझाने से ज्यादा रटाने पर केन्द्रित है, जिसके कारण बच्चे एक तोते की तरह पाठ्यक्रम को रटते रहते हैं। शिक्षा व्यवस्था पर काम करने वाली संस्था ‘निरंतर’ और ‘नेशनल कोएलिशन ऑफ़ एजुकेशन’ नो डिटेंशन पॉलिसी को हटाये जाने का पूरा जोर विरोध कर रहे हैं, इस मुहिम के समर्थन में ट्वीटर पर एक अभियान भी चलाया जा रहा हैं।  आप भी इस #DontFailRTE अभियान को सहयोग दे सकते हैं। समय-समय में शिक्षा व्यवस्था में सुधार का परिणाम ही ‘शिक्षा का अधिकार’ कानून है। लेकिन अब इस कानून की जरुरी बात यानि नो डिटेंशन पॉलिसी को हटाने की बात हो रही हैं, जो शिक्षा सुधार में किए गए कामों को पीछे करने जैसा है।

शिक्षा अधिकार कानून में हुआ संशोधन

साभार: अलका मनराल