पासपोर्ट ऑफिस में भेद-भाव और उत्पीड़न …

Married womenमहिलाओं को पासपोर्ट बनवाने या नए पासपोर्ट के ‘दोबारा बनवाने’ में कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है. व्यक्तिगत पहचान स्थापित करने के लिए केन्द्रीय सरकार ने आधार कार्ड की शुरुआत की. फिर भी पासपोर्ट दफ़्तर के अधिकारी महिलाओं से उनके पति या माता-पिता के बारे में भी जानकारी मांगते हैं. अगर किसी महिला के विवाहिक स्थिति में बदलाव होता है, तो पासपोर्ट अधिकारी उसके लिए भी कागज़ात मांगते हैं, चाहे महिलाओं के पासपोर्ट में उनके पति का नाम पहले से था या नहीं!

ऐसे मामलों में, पासपोर्ट अधिकारी उनसे कहते हैं कि यदि उनकी शादी हो जाये, तो उन्हें अपने पासपोर्ट में अपने पति का नाम जुड़वाना होगा. देखा जाये तो इसकी कोई ज़रुरत नहीं होती, लेकिन आज भी महिलाओं को या तो अपने पति या परिवार पर निर्भर ही माना जाता  है.

हाल ही में ग़ाज़ियाबाद (उत्तर प्रदेश) की रहने वाली एक महिला ने पाया कि उन्हें अपने पुराने पासपोर्ट को फिर से बनवाने में, फिर अपने पति का नाम पासपोर्ट में दर्ज करवाना पड़ेगा. जब उन्होंने पहली बार पासपोर्ट बनवाया था, तब तक उनकी शादी नहीं हुई थी इसलिए उन्होंने कहा कि  नया पासपोर्ट उनके पति के नाम के बगैर नहीं बन सकता था.

इन महिला का कहना था कि “इससे साफ़ पता चलता है कि सरकारी व्यवस्थाएं औरतों के ख़िलाफ़ होती हैं. अगर यही नियम है तो मर्दों से भी उनकी पत्नियों  के नाम भी पासपोर्ट में होने चाहिये, लेकीन ऐसा कभी नहीं होता.” ताज्जुब की बात ये है कि जब इनके पति ने कुछ साल पहले नया पासपोर्ट बनवाया तो उनसे पासपोर्ट अधिकारीयों ने उनकी शादी का कोई प्रमाण-पत्र नहीं माँगा.

इस तरह का जेंडर-आधारित भेद-भाव तलाक़ के मामलों में और अधिक स्पष्ट होता है. अगर किसी महिला का तलाक़ होता है तब उसको कोर्ट जाकर ‘तलाक़ विलेख’ जारी करवाना पड़ता है ताकि वो नए पासपोर्ट की अर्ज़ी दे सके. यहाँ तक कि अगर महिला ने शादी के बाद अपना नाम नहीं बदला हो, तब भी उसे  तलाक़ विलेख जमा करना पड़ता है.

भोपाल की श्रुति का पासपोर्ट अधिकारीयों के साथ कुछ ऐसा ही अनुभव रहा. श्रुति से उन्होंने उसके तलाक़ के बारे में ऐसे सवाल पूछे, जिनका पासपोर्ट से कोई समबंध नहीं था, जैसे- ‘अरे ये क्या हो गया?’,‘तलाक़ क्यों हुआ?’, ‘लड़ाई हुई या कुछ और?’ आदि. इस व्यवहार से श्रुति को अपमानित महसूस हुआ और उसने इन सवालों का जवाब देने से इनकार कर दिया. एक महीना बीत चूका है लेकिन अभी तक उसके पासपोर्ट के बारे में कोई ख़बर नहीं आई है.

ऐसे मामलों में कोर्ट ने महिलाओं के पक्ष में निर्णय दिए हैं पर पासपोर्ट दफ़्तर में इनका पालन नहीं किया जाता बल्कि पासपोर्ट वेबसाइट पर भी जब महिलाएँ इस मुद्दे पर सवाल उठाती हैं, तो पासपोर्ट अधिकारी वही पुराने जवाब देते हैं.