पारसी समुदाय का नया साल – नवरोज़

नवरोज़  का मतलब होता है नया दिन। पारसी लोग इससे अपने नए साल की शुरूआत मानते है। यह त्योहार कब से शुरू हआ इसके बारे में कुछ खास स्पष्ट नहीं है। कहते हैं कि ईरान का बादशाह इसी दिन गद्दी पर बैठा था। वह बसंत के पहले दिन प्रकृति का स्वागत करने के लिए  नवरोज़ मनाता था। पारसी समुदाय के लोग जमशेद  नवरोज़ के नाम से इस त्योहार को मनाते है।

सभी त्योहार में खान पान और साफ सफाई का बहुत महत्त्व होता है। नवरोज़ में भी पहले से ही पूरे घर की साफ-सफाई होती है। और इस दिन खाने का भी अपना एक अलग महत्त्व है।  नवरोज़ में पहली चीज़  सूजी, दूध और चीनी डालकर बनाई जाती है। इसे रवा कहते हैं। और इसे इतना पकाते है कि यह मोटी मलाई सी हो जाए। इसे कांच  के बर्तन में निकालते हैं और मेवों से सजाते हैं। उपहार के रूप में दूसरों के घरों में भी भेजते हैं। दूसरी चीज़  सेंवई  पकाते हैं। दोपहर को तरह-तरह के पकवान पकाते हैं। सुबह-सुबह लोग अग्नि मन्दिर जाते हैं जिसे अगियारी कहते है। यहां पर हर समय आग जलती रहती है। दस्तूर यानी पारसी पादरी प्रार्थना करते हैं। प्रार्थना के बाद सब एक दूसरे से गले मिलकर नए साल की मुबारकबाद देतेे हैं।

पारसी लोगों के घर में चांदी की थाली रखने की परंपरा है। उसमें गुलाब की कुछ पंखुड़ियां  नारियल, तिलक के लिए रोली और थोड़ा कच्चा चावल रखा जाता है। पूजा की इस थाली में गुलाब जल रखा होता है। मेहमानों के आने पर गुलाब जल छिड़क कर उनका स्वागत करते हैं।