पाबंदी के खिलाफ है लोकतंत्र

(फोटो साभार -काश्मीर मीडिया )
(फोटो साभार -काश्मीर मीडिया )

देश की दो तिहाई आबादी मांस खाती है। फिर भी हम भारत को शाकाहारी देश साबित करने पर तुले हैं। दरअसल शाकाहार या मांसाहार या फिर दोनों ही खाने के चुनाव के हक से जुड़ा मुद्दा है। लेकिन इन दिनों सरकार देश के लोगों को जबरदस्ती शाकाहारी बनाने पर तुली है।
गाय के मांस पर पाबंदी को लेकर उठा विवाद अभी खत्म भी नहीं हुआ था कि अब मुंबई में जैनों के धार्मिक उत्सव के दौरान गोश्त पर पाबंदी लगा दी गई। यह पाबंदी चार दिनों के लिए है। हालांकि आठ दिनों में एक एक दिन छोड़कर लगाई गई पाबंदी का असर पूरे आठ दिन तक रहेगा। इसलिए इसे आठ दिन की पाबंदी कहें तो गलत नहीं होगा। मगर क्या किसी एक खास समुदाय की आस्था के लिए दूसरे लोगों के खाने पर लगाई गई पाबंदी ठीक है? बस यही सवाल इन दिनों उठ रहा है। क्या खाने जैसे व्यक्तिगत मुद्दों पर सरकार की चलनी चाहिए?
इस रोक के समर्थकों का कहना है कि केवल आठ दिन मांस नहीं खाएंगे तो क्या आसमान गिर पड़ेगा। क्या यही सवाल हम उन शाकाहारियों से भी पूछ सकते हैं जो रोज खाने में दाल या सब्जी लेते हैं। आठ दिन के लिए क्या एक पूरे शहर में सब्जी या दाल में कर्फयू लगाया जा सकता है। एक और बड़ा सवाल वह लोग पूछ रहे हैं जो मांस उद्योग से ही रोजी रोटी कमाते हैं, कि क्या सरकार पाबंदी वाले दिनों की दिहाड़ी उन्हें देगी? पहनने के हक पर तो गाहे बगाहे मंत्री, नौकरशाह और कुछ कट्टरपंथी संगठन पाबंदियां थोपते ही रहते हैं लेकिन अब जिस तरह से खाने के हक पर पाबंदी लगाई जा रही है वह लोकतंत्र की धारणा के खिलाफ है।