पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगी, बेटी हमरी ऐसा काम करेगी, आप भी देखिए बेटियों के सपने

वो गाना तो आपने सुना ही होगा, ‘पापा कहते हैं बड़ा नाम करेंगा…बेटा हमारा ऐसा काम करेंगा…’ जी हाँ बेटा, 90के दशक में बने इस गाने को यदि 21वीं सदी में बनाते तो निश्चित ही इसमें बेटी को भी शामिल किया जाता, क्योंकि आज की बेटी भी कुछ बनना चाहती हैं।  

यहीं बात जानने के लिए हम निकाल पड़े हैं, बुंदेलखंड के बांदा की गलियों में जहां की लड़कियां 12वीं की परीक्षा दे रही है और साथ ही देख रही हैं सपने, कल कुछ बनने के लिए…

डॉक्टर बनने का सपना लिए रुचि आज 12वीं की परीक्षा देने आई हैं। उन्हें भरोसा है कि कल वह अपने डॉक्टर बनने के सपने को हकीकत दे पाएंगी। जबकि दीक्षा गायिका बनना चाहती हैं और प्रीति आईपीएस बनने का सपना देख रही हैं।

सेव दी चिल्ड्रन के एक सर्व के अनुसार, शहरों में 100 लड़कियों में से 14 लड़कियां 12वीं तक की पढ़ाई कर पाती हैं। जबकि गांवों में 100 में से 1 लड़की ही 12वीं तक पहुंच पाती हैं।

ये शहरों की 14 और गांवों 1 लड़कियां अपने जीवन में कुछ बनना तो चाहती हैं, पर उनके पास करियर चुनने में स्पष्टता, सही जानकारी और कौन सा फार्म भरना हैं, आदि की जानकारी की कमी है। वे आज भी करियर का चुनाव परिवार की सहमति और महिला सुरक्षा जैसी बातों को ध्यान में रखकर ही करती हैं।

मुस्कान भी उन्हीं लड़कियों में से एक हैं जो अपने माता-पिता की इच्छा से भविष्य में कुछ बनने का सपना देख रही हैं।

वहीं, प्रीति यादव खिलखिला कर कहती हैं कि उन्हें टीचर बनना है क्योंकि यह सबसे आसान और अच्छा चुनाव है। जबकि संध्या कहती हैं कि टीचर बन कर वह दूसरों का भविष्य सुधार सकती हैं।  

यही कहना पूजा का भी है कि टीचर बन कर हम अपनी ही तरह की लड़कियों को बेहतर शिक्षा दे सकते हैं और जो दिशानिर्देश हमें नहीं मिल पाए वह हम दूसरों को दे सकते हैं ताकि उन्हें अपना करियर चुनने में दिक्कत का सामना न करना पड़े।  

महिला समानता की हम चाहे कितनी भी बातें कर लें, लेकिन असमानता को हम दरकिनार नहीं कर सकते हैं और ये असमानता विद्यालयों तक ही नहीं हैं बल्कि नौकारीयों में भी है।

नौकरीयां देने वाली एक कंपनी, मोंस्टर डॉट कॉम की रिपोर्ट के अनुसार, देश में महिलाएं पुरुषों की तुलना में 25% कम आमदनी कमाती है। वहीं, एक पुरुष की एक घंटे की कमाई 345.80 रूपये हैं जबकि एक महिला की कमाई 259.8 रुपये है।

घर, स्कूल, विद्यालय और नौकारी तक के सफर में होने वाले इस भेदभाव को क्या वाकई हमारी बेटियों और बहनों को बराबरी के अधिकार और एक स्वतंत्र व्यक्तित्व का निर्माण करने दे रहे हैं ? माना कि अब लड़कियाँ सपने देख रही हैं पर उनके सामने चुनौतियां भी कई हैं।

रिपोर्टर- मीरा देवी 

20/04/2017 को प्रकाशित