पलायननामा: यूपी संपर्क क्रांति यात्रियों के साथ

जिला चित्रकूट, अउर बांदा पलायन-यहिकर मतलब होत हवै गांव छोड़ के चले जाब।जबै मड़इन के लगे कउनौ चारा नहीं रहि जायें। रोजगार नहीं रहत अउर कमायें के सबै रास्ता बंद होइ जात हवैं।तबै मजबूरी मा मड़इन का भागे का पड़त  हवै।बुन्देलखण्ड के तेरह जिलन के मड़इन पलायन करब जिन्दगी का हिस्सा बन गा हवै। मड़ई  सम्पर्क क्रांति ट्रेन से लोधियाना,पंजाब अउर दिल्ली जाके काम करत हवैं।2016 मा ट्रेन के बिक्री से पता चला हवै कि अठारह लाख मड़ई दिल्ली पलायन करिन हवैं।
चित्रकूट का रहै वाला दिनेश बताइस कि  मोर गांव से  मानिकपुर पछहत्तर किलोमीटर दूरी हवै।जबै दिल्ली जायें का होत हवै तौ मानिकपुर से ट्रेन मा बइठित हवै काहे से हिंया से सीट मिल जात हवै।दिल्ली मा कम्पनी मा काम करत हवै खेती मा कुछौ पैदा नहीं होत रहै  यहै कारन  बाहर जाये का पड़त हवै।
चित्रकूट का दिनेश बताइस कि मैं डेढ़  साल से अमृतसर कमाये खातिर जात हौ काहे से हिंया कउनौ व्यवसाय  नहीं आय बरगढ़ के ग्लास फैक्ट्री बीसन साल से बंद पड़ी हवै वा चल जात तौ मड़इन का बाहर न जाए का पड़त।
बांदा का विनोद बताइस कि हिंया मजदूरी करै मा डेढ़ सौ रुपिया मिलत है बाहर ज्यादा रुपिया मिली तौ बच्चा पढ़-लिख सकत हैं। ट्रेन मा भीड़ के कारन पियें का पानी तक नहीं मिलत आय यहिसे सफर बहुतै कठिन होइ जात हवै।
बांदा का धनराज बताइस कि अतर्रा से मानिकपुर ट्रेन मा बइठे आवें  का पड़त है काहे से सम्पर्क क्रांति के अलावा कउनौ स्थाई ट्रेन नहीं आय।का इं मड़इन के सपना पूर होइहैं या अधूरी आस लइके वापस आवें का पड़ी।

बाईलाइन-मीरा देवी और कविता

27/10/2017 को प्रकाशित