पलायननामा: पीढ़ी दर पीढ़ी चल रहा पलायन बुंदेलखंड में

बुंदेलखंड अपनी विरासतों के कारण ही नहीं बल्कि लगातार होते पलायन के कारण भी जाना जाता है। कितने ही परिवार है यहाँ जो बरसों से पलायन कर रहे हैं जिसकी वजह से बुंदेलखंड के गाँव अपने मूल निवासियों से कटता जा रहा है।
बकटा बुजुर्ग गांव का ऐसा ही एक परिवार है जो पीढ़ी दर पीढ़ी पलायन करने को मजबूर हैं। परिवार की माने तो वह कभी भी पलायन नहीं करना चाहते लेकिन रोजगार और जरुरी सुविधाएँ उपलब्ध होने के कारण उन्हें पलायन करना ही पड़ता है।
इस परिवार की प्रमुख अल्पना देवी कहती है कि मेरे पति रामदीन दस सालों से बाहर जा रहे हैं, मज़बूरी है क्या करें। यहाँ कामकाज ही नहीं है।
रामदीन का कहना है कि गाँव में कोई काम नहीं है। ग्राम सभा और विकास अधिकारी की तरफ से किसी भी तरह की कोई मदद भी नहीं मिलती है। किसानों का काम और 100-200 की मजदूरी मिलने से क्या होता है। परिवार को इससे दो वक़्त की रोटी भी नहीं मिल सकती है।
रामदीन के पिता भी पलायन कर गये थे और अब रामदीन कर रहे हैं। इस पर रामदीन कहते हैं कि बच्चों की पढ़ाईलिखाई और अपने लिए भी हम कुछ सोच नहीं पाते हैं। सोचा तो था कि जो हमें नहीं मिल सका वो परिवार को दे सकेंगे लेकिन ऐसे हालात नहीं हैं। महीनें पर पांच हजार मिलने पर क्या हम खाएं, क्या बचाएं और क्या अपना विकास करें। समस्याएं बहुत है लेकिन उनका हल कहीं नहीं मिलता, हार कर हम पलायन कर जाते हैं और यही एक रास्ता हमें नजर आता है।
पलायन हमें चेताते हैं कि असुविधाओं और बेरोजगारी के चलते देश के गाँव नष्ट होते जा रहे हैं। दूसरी तरफ हमारी सरकार है जोसबका साथ सबका विकासजैसे जुमलों से लोगों को भ्रमित कर रही है। क्या सच में बुंदेलखंड के लोगों का पलायन कभी रुक पायेगा? क्या सबका साथ सबका विकास का नारा लगाने वाली सरकार बुंदेलखंड से पलायन को रोक पायेगी?
बाईलाइन-सहोद्रा
02/11/2017 को प्रकाशित