पडुई गांव में हो रहा विकास का ढ़ोंगः तीन दिन में सड़कें, सब जगह शौचालय और सबके लिए राशन कार्ड

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जि़ला बांदा, ब्लाॅक बड़ोखर खुर्द, गांव पडुई। पडुई गांव 2014-15 के लिए डाॅक्टर राममनोहर लोहिया समग्र ग्राम विकास योजना के तहत लिया गया था। इस हफ्ते उत्तर प्रदेश मुख्य सचिव आलोक रंजन ने विकास कार्य का जायज़ा लेने के लिए पडुई गांव का दौरा किया।

उनके दौरे से पहले गांव में काफी हलचल मच गई। गांव में मौजूद कमियों को दूर करने के लिए जि़ला, तहसील और ब्लॉक स्तर अधिकारी हरकत में आ गए।
कैसे एक गांव अपने आप को ठीक कर सकता है, विकसित लग सकता है, आदर्श दिख सकता है, एक ऊँचे दर्जे के दौरे से ठीक पहले?
पडुई में हमने पाया कि ये कुछ ही दिन में किया जा सकता है।
गांव के राममनोहर प्रजापति का कहना है, ‘‘मेन सड़क से गांव को जोड़ने वाली सड़क दस साल से टूटी पड़ी थी। आने जाने में गड्ढों में तबदील सड़क से गुज़रना मुश्किल था। इस सड़क को बनवाने के लिए पी-डब्लयू-डी में कई बार कहा लेकिन कोई कार्यवाही नहीं हुई। अब मुख्य सचिव को आना है तो सिर्फ दिखावे के लिए सड़क बनाई जा रही है। उखड़ी सड़क के ऊपर से ही छोटी वाली गिट्टी बिछा के मोरमीकरण किया जा रहा है। अगर बन रही है तो नए सिरे से बनना चाहिए।’’
हमने देखा अधिकारी लोगों के घरों में जा रहे हैं। उनके स्वास्थ्य के बारे में पूछ रहे हैं। बूढ़ों, विधवाओं विकलांगों के बारे में और समाजवादी पेंशन के बारे में पूछ रहे हैं। प्रशासन द्वारा कई कल्याणकारी योजनाओं पर विवरण लिए गए हैं- राशन कार्ड, इंदिरा आवास, शौचालय, सूखे से राहत संबंधी, पानी, बिजली और टीकाकरण कार्यक्रम।

लोग कह रहे थे कि सरकारी योजनाओं को पाने के लिए, विभागों के चक्कर काटते-काटते थक जाते हैं, आज हमारी किस्मत चमक गई कि विभाग ही लोगों को योजनाओं का लाभ देने के लिए ढूंढ़ रहे हैं।
कई टीमें गांव में भेजी गईं, लोगों को मुफ्त दवाएं देने के लिए। आंगनवाड़ी और एएनएम को पंजीरी बांटने के लिए और टीकाकरण कैंप लगाने के लिए कहा गया। पडुई जिसने 1980 से बिजली नहीं देखी थी उसे अब बिजली के खम्बे, तार और यहां ताकि सौर ऊर्जा दी जा रही थी।
बांदा जि़ले के आठ ब्लॉकों से सफाई कर्मचारियों की फौज आई थी गांव की संकरी गलियां और बदबू मारते नाले साफ करने के लिए।
गाँव के प्राथमिक विद्यालय में भी बहुत हलचल थी। दीवारों पर नया पेंट हो रहा था। चारदीवारी बनाई जा रही थी। शौचालय में नई सीट लगाई जा रही थी और पूरे विद्यालय की सफाई की जा रही थी।
विद्यालय में पांच व्यक्तियों का स्टाफ था- प्रिंसिपल और चार शिक्षक, 308 विद्यार्थियों के लिए। एबीएसए बड़ोखर खुर्द के विद्यालय से पांच और शिक्षकों को बुला लिया गया। क्या वे मुख्य सचिव के जाने के बाद भी पडुई के विद्यालय में ही पढ़ाते रहेंगे?
मुख्य सचिव का दौरा पडुई में चर्चा का विषय बन गया है। लोग ये आशा करने लगे हैं कि लखनऊ से अधिकारी ऐसे ही दौरे करते रहें। ‘‘आलोक रंजन को तो जि़ले के सारे 703 गांवों का दौरा करना चाहिए।’’

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पडुई गांव में हर दिन, हर महीने पूरे साल विकास की ज़रुरत है। मगर ये कैसी स्थिति है कि जिन अफसरों को गांव का नाम भी नहीं पता वे इसमें रातें बिता रहे हैं। जहां गांव वाले अपने आस पास होने वाले विकास को लेकर खुश है वहीं एक विडंबना भी उन्हें घेरे खड़ी है- कैसे हमारी सरकार अपने में से एक को ही बेवकूफ बनाने की कोशिश कर रही है। खुले आम की जा रही विकासकार्यों की खानापूर्ति की पोल प्रशासन खुद ही खोल रहा है।

मज़े की बात ये है कि ये पहली बार नहीं है जब ये जल्दी-जल्दी, ऊपर-ऊपर का मेकअप किया गया है। 2012 में जब मुख्यमंत्री मायावती बांदा जि़ले के महुआ ब्लॉक का दौरा करने वाली थीं, अंबेडकर ग्राम बरसादा खुर्द को भी इसी तरह तैयार किया गया था। उस दौरे के दौरान बरसादा खुर्द हीरे की तरह चमक रहा था, किसी शहर से ज़्यादा। मगर ये तीन दिन में किया गया विकास मायावती को बेवकुफ नहीं बना पाया।