नोटबंदी के शोर गुल में संसद का शीतकालीन सत्र पड़ा ठंडा

संसद का शीतकालीन सत्र जो 16 नवम्बर को शुरू हुआ था, ठीक एक महीने बाद 16 दिसम्बर को खत्म हो चूका है, लेकिन नोटबंदी, अगस्ता वेस्टलैंड हेलिकॉप्टर घोटाला, किरन रिजिजू और कुछ अन्य मुद्दों को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच गतिरोध जारी रहने के कारण पूरा सत्र हंगामे की भेंट ही चढ़ गया।
‘पी आर एस लेजिस्लेटिव रिसर्च’, जो संसद के कामों पर नजर रखती है, के मुताबिक, लोकसभा में 15 प्रतिशत तो राज्यसभा में 17 प्रतिशत ही काम हो सका है। मोदी सरकार के ढाई साल के कार्यकाल के दौरान संसद में सबसे कम काम हुआ।
संसद के शीतकालीन सत्र में पहले नोटबंदी को लेकर हर दिन हंगामा होता रहा। विपक्ष की मांग थी कि पी एम मोदी की मौजूदगी में सदन में नोटबंदी पर चर्चा हो। कांग्रेस ने वोटिंग के तहत सदन में चर्चा की मांग की, जबकि सरकार इस पर राजी नहीं हुई। बाद में पी एम कई मौकों पर सदन में मौजूद रहे, लेकिन हंगामा नहीं थमा। दोनों पक्ष एक-दूसरे पर चर्चा नहीं करने का आरोप लगाते रहे।
मोदी सरकार के ढाई साल के कार्यकाल के दौरान संसद के 8 सत्र हुए हैं। इससे पहले इस साल के मानसून सेशन-2015 में लोकसभा का उत्पदता 48 प्रतिशत रहा। मानसून सेशन-2015 में ही राज्यसभा उत्पादता सबसे कम 9 प्रतिशत रहा।
शीतकालीन सत्र में कई जरूरी बिल पेश होने थे, जैसे सरोगेसी बिल, मातृत्व लाभ बिल इत्यादि। लेकिन हंगामे की वजह से यह संभव नहीं हो सका और सिर्फ दो बिल ही पास हो सके। 15 सालों में ये संसद का सबसे कम फलदार सत्र रहा है।
यहाँ तक की राष्ट्रपति प्रणब मुख़र्जी और उपराष्ट्रपति हमीद अंसारी ने भी इस बात पर सरकार और विपक्षी दलों की घोर निंदा की।