नोटबंदी की सच्चाई

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पिछले साल आठ नवम्बर को हुई नोटबंदी ने देशवासियों को लाइन में लगा दिया। उस समय प्रधानसेवक नरेन्द्र मोदी के चौकानें वाले ऐलान को लोगों ने सकारत्मक कदम मानकर पचा भी लिया, पर कुछ समय के बाद जीडीपी 8 फीसदी से गिरकर 6.1 फीसदी पर आ गई। साथ ही नोटबंदी ने अनौपचारिक क्षेत्र में नौकरियां को कम किया। बाजार में से अचानक इतनी नकदी कम होने से व्यापार भी गिरा।
नोटबंदी करने के पीछे के उदेष्यों पर बात करें तो पहला कारण कालेधन खत्म करना, दूसरा कारण नकली नकदी पर रोक लगाना और तीसरा कारण नक्सलियों व आतंकवादियों को खत्म करना था। लेकिन बड़े दुख के साथ कहना पड़ रहा हैं कि तीनों उदेश्यों में से एक भी पूरा नहीं हो पाया।
कालाधन की बात करें तो अब रिजर्व बैंक के पास 99 फीसदी पैसा आ गया है, तो कालाधन आने की बात फुस साबित हो गई है। देश में नकदी के रुप में कालाधन का प्रतिशत पांच छह ही हैं, जबकि एक बड़ा भाग अचल धन के साथ सोना-चांदी के रुप में है। तो ऐसे में कालाधन नोटबंदी से निकालना बेकार ही है। नकली नकदी पकड़ने की बात करें तो ज्यादा नकली नकदी नहीं निकली। हां! पर बैंकों को हजार और पांच सौ के नोट संभालने में खासी परेशानी हुई। नोटबंदी से आंतकवादी घटनाओं को कम करने की बात भी गलत साबित हुई, क्योंकि उसके बाद आंतकी घटनाओं में कोई कमी नहीं आई।
नोटबंदी के एक साल बाद ये बात जगजाहिर हो गई है कि नोटबंदी बेकार फैसला था। हालांकि अब सरकार नोटबंदी के बचाव में कह रही हैं कि ये डिजिटल लेन-देन को बढ़ाने में भी मदद कर गई। साथ ही नोटबंदी के तत्कालीन प्रभाव न हो पर दीर्घकाल में इसके फायदे जरुर दिखेंगे, खैर! हम उसका इंतजार कर सकते हैं। नोटबंदी से होने वाली सारी परेशानियों को देखते हुए शायद सरकार का ये फायदे गिनाना बेकार है, साथ ही केन्द्रीय सरकार अर्थव्यवस्था को प्रयोगशाली नहीं बनाए, जहां कोई भी प्रयोग किया जाए।