नोटबंदी की मार सहते बाँदा के किसान

जिला बांदा, 24 दिसम्बर 2016। नोटबंदी को 1 महीना 13 दिन से ऊपर होने को हैं, और समय बीतने के साथ ही लोग रोज ही बाजार में नकदी की कमी से होने वाली परेशानियों से गुजर रहे हैं। नोटबंदी से सबसे ज्यादा परेशानी ग्रामीण इलाकों में देखने को मिल रही है, क्योंकि वहां लोगों को ऑनलाइन बिक्री और खरीदारी समझ नहीं आ रही है। वहीं ग्रामीण बैंक शाखों में इतनी नकदी भी नहीं हैं कि वे सबकी जरुरतों को पूरा कर सके। अब किसानों को धान को बेचने में परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। उन्हें नकदी की कमी के कारण सरकारी रेट 1470 मोटा धान और 1550 पतला धान प्रति कुन्तल बिकने वाला धान सीधे व्यापारियों को 800 से 900 की कीमत में बेचना पड़ रहा है। व्यापारियों को बेचने की मुख्य वजह सीधे नकदी हाथ में आ जाना है, जबकि सरकारी खरीद में पैसा सीधे बैंक खातों में जा रहा हैं, जिससे बैंक से पैसा निकालने में परेशानी हो रही है।

ये समय रबी की फसल लगाने का है और इस ही समय नोटबंदी के कारण किसान बीज और खाद नहीं खरीद पा रहे हैं। कुछ किसानों को खेतों में फसल लगानी है, तो कुछ को लगी फसल में खाद डालनी है। आपको बता दें कि रबी की फसल अक्टूबर से नवम्बर के महीने में लगाई जाती है,जिसमें गेहूं, जौ, चना, मसूर और सरसों की फसले होती है।

3 कुन्तल धान बेचकर आए ज्ञान बाबू बताते हैं कि उन्हें 3300 रुपये का धान बेचा हैं, पर उन्हें व्यापारी ने 2 हजार रुपये देकर बाकी के पैसे एक हफ्ते बाद देने की बात कही है। उनके अनुसार सभी किसान घाटा खाकर धान व्यापारियों को 800 या 900 रुपये में बेच रहे हैं, जबकि धान की सरकारी कीमत 1470 से लेकर 1550 रुपये प्रति कुन्तल है। वह सरकारी मंडी में धान न बेचने की वजह पैसा बैंक में जाने की बात कहते हैं।

बाला प्रसाद, 50 नकदी की कमी से परेशान हैं। वह भी 10 कुन्तल धान बेच चुके हैं पर उन्हें 4000 रुपये भी हाथ में मिले हैं। वह कहते हैं, “पैसे न होने के कारण सारा धान उधार में ही जा रहा है।” बाला प्रसाद प्रधानमंत्री के नोटबंदी के कार्य को तो सही बता रहे हैं, पर वह नोटबंदी को फरवरी के महीने में करने पर किसानों को कम परेशानी होने की बात भी कहते हैं।

इस समय मिट्टी में नमी है, जिसके कारण किसान जल्द से जल्द अनाज बोना चाह रहे हैं। पर हाथ में पैसे नही होने के कारण वे ऐसा कुछ नहीं कर पा रहे हैं।

नरैनी धान खरीद केंन्द्र के अधिकारी प्रेम शंकर तिवारी इस बात को नकार देतें हैं कि सरकारी धान खरीद पर नोटबंदी का प्रभाव पड़ा है।वे कहते हैं, “हमें 162 कुन्तल 75 किलो धान अभी तक खरीदा है।” वह आगे बताते हैं कि किसानों को पैसा उनके बैंक खाते में दे दिया जा रहा हैं।

पर वह नहीं जानते कि किसानों को एक, दो हजार रुपये ही बैंक से मिल पा रहे हैं, जिसे किसानों को खेती के काम में बहुत परेशानी हो रही है और इन ही पैसों से उन्हें अपने घर का खर्च भी चलाना है।

रिपोर्टर- गीता

20/12/2016 को प्रकाशित