नोटबंदी ‘असुविधा’ नहीं, बल्कि जीवन और मृत्यु का मुद्दा

 साभार: माइकल फोली/फ्लिकर
साभार: माइकल फोली/फ्लिकर

मदर डेयरी और केन्द्रीय भंडार ग्रामीण भारत की पहुँच से बहुत दूर है और सरकार ने नीतिगत उपायों की एक श्रृंखला के चलते हुए नोटबंदी के प्रतिकूल प्रभावों को सोचे बिना जारी किया है। भारत के गरीब और उनके लिए बनी खाद्य सुरक्षा की नीतियां इस नोटबंदी का सामना कैसे करेंगी, इसको अनदेखा किया गया है।
भारत की गरीबी के आंकड़े अब वास्तविकता में प्रवेश कर रहे हैं। आधिकारिक तौर पर, 2012 में भारत की आबादी का लगभग 22 प्रतिशत गरीबी रेखा से नीचे था, जबकि पोषण के मामले में यह आंकड़ा कहीं ज्यादा था। इस स्थिति के साथ, नोटबंदी का खाद्य सुरक्षा पर विनाशकारी प्रभाव हो सकता है।
खाद्य सुरक्षा और पोषण दोनों एक दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एन एफ एच एस) के अनुसार, भारत में 43 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। जबकि, देश के 55 जिलों में पांच साल की उम्र तक के 50 प्रतिशत बच्चों में कुपोषण पाया गया।
एन एफ एच एस के एक नए सर्वेक्षण वर्तमान के परिणामों की एक निराशावादी तस्वीर दिखाते हैं। इसके अनुसार, भारत में 55 प्रतिशत महिलाओं में खून की कमी पायी जाती है। वहीं, भारत में उम्र से कम लम्बाई वाले बच्चों का प्रतिशत 48 है, जो बेहद चौंकाता है।
वहीं, यह आंकडें गरीबी से और भोजन की बर्बादी से सम्बंधित है। पोषक तत्वों का बर्बाद हो जाना यानी वजन का कम होना लम्बाई के लिए। भारत में हर पांच में से एक बच्चा इस बर्बादी में शामिल है। जनसंख्या का यह भाग सबसे बड़े जोखिम का सामना कर रहा है।
भारत की 73 प्रतिशत जनता बैंकों से लगभग दूर है और ऐसे में नोटबंदी इस स्थिति को और विनाशकारी बना रही है। ग्रामीण बैंकिंग बेहद खराब है। वहीं इसे सुधारने के लिए प्रधानमंत्री की जनधन योजना में नए 25 करोड़ खाते खोले गये हैं।
सरकार कहती है कि वह भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रही है और उसी के लिए नोटबंदी एक बहुत बड़ा कदम है लेकिन इसमें ग्रामीण जनता अधिक परेशानी में आ गई है। ऐसी जनता के लिए बिना नोटों के रोज कमाने और खाने की कवायत में बाजार मंदा और काम नहीं है।
भूख और कुपोषण की वजह से लोगों को बीमार और मर जाना इस नोटबंदी का सबसे नकारात्मक पहलू है और इसे नजरअंदाज करना सरकार का निराशाजनक रवैय्या है।

साभार: द वायर