नीमखेड़ा, अब नहीं रही महिलाओं की पंचायत

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(फोटो साभार- गजेन्द्र यादव)

रविवार को जैसे रुखसार ने शाम की नमाज़ पढ़ी हरियाणा के मेवात जि़ले में उसके गांव में इतिहास रचा गया और रचा इतिहास मिटा दिया गया। हरियाणा सरकार द्वारा लगाई गई अशिक्षित उम्मीदवारों पर रोक से मजबूर होकर यहां मौजूद नीमखेड़ा नाम के छोटे से गांव ने जिसने दस साल पहले देश की पहली सिर्फ औरतों की पंचायत बना कर इतिहास बना दिया था एक बार फिर पंचायत में मर्दों की प्रमुखता स्थापित कर दी। इस हफ्ते इसमें सात मर्दों और चार औरतों का चुनाव किया गया।
हालांकि इस योग्यता के मानदंड ने गांव की पहली महिला सरपंच अशूभी बाई (पचपन वर्ष) के एक दशक के मार्गदर्शक काम पर रोक लगा दी मगर साथ ही ये नीमखेड़ा की ग्राम पंचायत में पीढ़ी का बदलाव भी ले आया। यहां अब तक की सबसे युवा पंचायत चुनी गई। नया सरपंच शकील हुसैन (पैंतीस वर्ष) और सारे पंच चालीस साल से कम हैं। तेईस साल की रुखसार जिसने संस्कृत में एमए और साथ ही बीएड किया है उन सबमें सबसे छोटी है।
नीमखेड़ा के निवासियों के विचार हरियाणा के इस नए कानून के नुकसान और फायदों के बारे में बंटे हुए हैं। जहां इससे युवाओं का सशक्तिकरण हुआ है वहीं गरीब पूरी तरह बाहर रह गए हैं। जितने भी लोगों का चुनाव हुआ है वे मध्यम वर्ग या उच्च मध्यम वर्ग से हैं। जिनके दूर या पास का कोई रिश्तेदार पंच या सरपंच रहा था। जैसे सरपंच शकील के पिता दस साल तक नीमखेड़ा के सरपंच थे। रुखसार की सास मेहमूदी 2005 में चुनी गई पंचायत में शामिल थीं।