नागम्मा, एक निडर महिला…

27 सितंबर, 2007 को अपने पति की मौत के बाद नागम्मा को दो साल लगे ये समझने में कि उनके पति अब उनके साथ नहीं हैं। नागम्मा की दो बेटियां अब उनका आसरा हैं। नागम्मा ने अपनी पति की मौत के बाद कड़े संघर्ष के साथ अपने परिवार को संभाला है।27 सितंबर, 2007 को अपने पति की मौत के बाद नागम्मा को दो साल लगे ये समझने में कि उनके पति अब उनके साथ नहीं हैं। नागम्मा की दो बेटियां अब उनका आसरा हैं। नागम्मा ने अपनी पति की मौत के बाद कड़े संघर्ष के साथ अपने परिवार को संभाला है। नागम्मा के पति की मौत गटर की सफाई के दौरान दम घुटने से हो गयी थी। इसमें सबसे ज्यादा उन्हें जिस बात ने परेशान किया वो था उनकी जाति और सफाई कार्य करने के लिए मजबूर होना।  नागम्मा की छोटी बेटी श्याला नर्सिंग की पढ़ाई कर रही है। उन्हें ठीक से अंग्रेजी बोलना नहीं आती क्योंकि उनकी स्कूली शिक्षा तमिल स्कूल में ही हुई है। उनके पास इतने पैसे भी नहीं कि अंग्रेजी सीखने के लिए कोचिंग ले सकें। इन सबके बाद भी श्याला विचलित नहीं होती और अपनी पढ़ाई को जल्द पूरा करके अपनी माँ का हाथ बंटाना चाहती हैं। नागम्मा ने अपने परिवार को चलाने के लिए अपने घर के सामने ही किराना की दुकान खोल ली। जिसके लिए उन्होंने 20000 रूपये का अखिल भारतीय संगठन से कर्जा भी लिया था। सफाईकर्मीयों के लिए बनाये गये 2014 के सुप्रीमकोर्ट के नियमों के अनुसार उन्होंने अपने पति की मौत का हर्जाना वसूलने के लिए कौर्ट में याचिका दायर की, जिससे उन्हें 2016 में 10 लाख रूपये की मदद मिली।  नागम्मा की बड़ी बेटी आनंदी गर्व से कहती हैं, “मेरी माँ एक निडर महिला है। हालांकि वह अशिक्षित है लेकिन फिर भी वह किसी भी बड़े अधिकारी से बात करने का विश्वास रखती हैं। मेरी माँ ने बहुत संघर्ष किया है और अभी भी कर रही हैं।” नागाम्मा कहती हैं, 2007 में मेरे पति का निधन हो गया, और इतने संघर्ष और संगठन के समर्थन के साथ मुझे 2016 के अंत तक मुआवजा मिला। 2014 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक, मुझे उसी वर्ष मुआवजा मिलना चाहिए था लेकिन हमारे यहाँ न्याय देने की व्यवस्था नहीं है। वो भी तब जब आप दलित हों या किसी ऐसी जाति से हों जो सफाई का काम करती हैं। मुझे मेरी बेटियों के लिए न्याय चाहिये था जो अब मेरा हक़ है।

साभार: पारी, अंक 17 जून 2017