धरना देय खा काय मजबूर किसान?

इतिहास के पन्ना में भारत देश खा कृषि प्रधान देश कहो जात हे, पे अब भारत देश खाली कागज के पन्ना में ही कृषि प्रधान देश रह गओ हे। हम बात करत हें बुन्देलखण्ड के महोबा जिला की। जिते को किसान हमेशा बाढ़ ओलावृष्टि या फिर सूखा जेसी कोनऊ न कोनऊ गम्भीर समस्या से जूझत रहत हे। ओर आपन परिवार पाले के लाने सरकार से मदद मिले के गोहार लगाउत हे, पे सरकार की मदद किसानन खा ऊंट के मुंह में जीरा साबित होत हे। ईखा ताजा उदहरण महोबा शहर के कचहरी परिसर में भारतीय किसान यूनियन ने ई साल सूखे की मार झेल रहे किसानन खे लाने उचित मुआवजे की मांग के साथे कर्ज माफी के मांग करी, पे सरकार के कानन में जूं तक नई रेंगी आय। जीखे कारन परिवार पाले जेसी समस्या खा लेके 25 जुलाई 2014 से 30 जुलाई 2014 तक क्रमिक अनशन करके सरकार खा चेतावनी दई कि अगर हमाई मांगे पूरी न होहंे तो आमरण अनशन करें पे मजबूर हो जेबी। अब सवाल उठत हे सरकार के ऊपर कि जभे फरवरी 2013 में भई बारिश ओर ओलावृष्टि से ही किसान भुखमरी की कगार में हे, ओर अब खरीफ की फसल से भी जमीन खाली परी हे। तो सरकार सूखा काय नई घोषित करत आय? जब किसान साल में एकऊ फसल नींक से न उगा पेहे तो का आपन खाल बेंच के सरकार को कर्ज भरहे? का किसान की आवाज बिना धरना प्रदर्शन करे सरकार तक नई पोंहच पाउत आय? या आवाज सुने के बाद भी सरकार जान खे अनसुनी करत हे?