देश के गरीब समुदायों को समृद्धशाली बना सकता है तेंदु पत्ता

साभार: विकिमीडिया कॉमन्स

गोपाल कुमेती नवम्बर की सुबह में तेंदु के फल को सूखने के काम में लगे थे। वह इस फल को सूखने के बाद 5 महीने तक सुरक्षित रख सकते हैं। गांवों में जिन लोगों के पास अनाज नहीं होता है, वे इस ही सूखे फल को खाकर जीते हैं। गोपाल पूर्वी महाराष्ट्र की एक ग्रामसभा के प्रधान हैं। गोपाल के अनुसार तेंदु का पेड़ 35 साल बाद देखना दुर्लभ हो जाएगा।
पूर्वी महाराष्ट्र के गोंडिया जिले के 18 गांवों का कारोबार इस तेंदु पत्ते से ही चल रहा है। तेंदु पत्ते का प्रयोग मुख्य रुप से बीड़ी बनाने के काम में होता है। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा और महाराष्ट्र ने 2012 में 1,900 करोड़ की संपत्ति तेंदु पत्ता बेचकर कमाई। छत्तीसगढ़ सरकार ने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में तेंदु पत्ता के काम में लगे लोगों को हाल ही में 274 करोड़ का बोनस देने की घोषणा की है। महाराष्ट्र की 9.4प्रतिशत जनसंख्या आदिवासी है, जिसमें से 42.4 प्रतिशत आदिवासी गरीबी रेखा से नीचे हैं। महाराष्ट्र में 440,000 परिवार तेंदु पत्ते को जमा करने का काम करते हैं। महाराष्ट्र के 104 गांवों इस पत्ते के कारोबार से 9.8 करोड़ कमाते हैं। लेकिन ये कारोबार बाजार की कम समझ होने के कारण ग्रामीण खुद से नहीं कर पाते हैं।