दिवस मनावैं के साथै सोच बदलब जरूरी

बुन्देलखण्ड के सबसे पिछड़े इलाका बांदा अउर चित्रकूट जिला मा दलित, कोल, आदिवासी, गरीब, महिला अउर मजदूर हैं। जहां उनके अधिकारन के कउनौ कदर नहीं कीन जात आय। चाहे समाज अउर समुदाय के बात कीन जाय या फेर पुलिस प्रशासन के। उनका यतना आसानी से आपन अधिकार नहीं मिलत आय। इनके अधिकार देवावैं खातिर सरकारी अउर गैर सरकारी संस्था काम करत हैं।
10 दिसंबर मानवाधिकार दिवस के रूप मा माना जात है। या मारे आज के दिन जघा-जघा मा मीटिंग, गोष्ठी अउर बइठक कीन जात है। 10 दिसंबर 2014 का भी बांदा अउर चित्रकूट जिला मा बइठक गोष्ठी अउर मीटिंग कीन गे हैं। दिवस मनावब जरूरी है, पै या सिर्फ एक दिन के बात न होय का चाही। मानव अधिकार हर दिन मिलैं यहिके कोशिश होय का चाही।
मानवाधिकार के सुरक्षा करैं अउर अधिकार देवावैं वाला सरकार का महत्वपूर्ण अंग पुलिस विभाग के बात कीन जाय तौ अधिकर दंे का निष्पक्ष काम कीन जायें का चाही। यहिके खातिर पुलिस प्रशासन सबसे पिछड़े लोगन के अधिकारन का समझै अउर उनके रक्षा करै। तबै सही मायने मा या दिवस मनावैं का उद्देश्य पूरा होई।