दाग अच्छे हैं!

साभार: विकिपीडिया

शिंगणापुर मंदिर, सबरीमाला मंदिर, हाजी अली दरगाह और अभी पैडमैन फिल्म का नाम आते ही छुआछुत का कारण बन चुके मासिकधर्म का ख्याल आता है। आज भी धार्मिक कामों में महिलाओं की अनुपस्थिति का कारण भीउसका साफ (शुद्ध) नहीं होना ही होता है। मासिकधर्म को अशुद्धता मान लिया जाता है, जबकि स्वास्थ्य के नजरिए से देखें तो ये समय महिलाओं के शरीर की सफाई का समय होता है। लेकिन पुरुष प्रधान इस समाज में महिलाओं के शरीर और उसे जुड़ी हर बात को छुपाने की कोशिश होती रही है।
पिछले कुछ सालों से सीदियों से चली आ रही प्रथा बदली है जैसे महिलाओं के लिए पाबंदी वाले मंदिर और दरगाह में उन्हें जाने दिया जा रहा है। हाल ही में अभिनेता अक्षय कुमार की फिल्म पैडमैन इस ही विषय में समाज की सोच बदलाने की कोशिश है, फिल्म में देश के गांवों में मासिकधर्म को शर्म का विषय बताते हुए इसपर चुपी रखते हुए मरना पसंद करने की बात कहने वाले संवाद है। अक्षय कुमार गांव की महिलाओं को पैड का प्रयोग करने की सलाह देते हैं, जिसके कारण उन्हें महिलाओं के साथ समाज के कोप का भंजन बनना पड़ता है। ये तो फिल्मी कहानी थी, पर हमारी फिल्में भी समाज का ही शीश हैं, जो समाज में वहीं इस फिल्मी दुनिया में।
फैजाबाद और चित्रकूट जिले में खबर लहरिया ने जब इस मुद्दे पर महिलाओं की चुप्पी तोड़ने की कोशिश की तो हमें मिले जवाब कुछ इस तरह थे।  
रीता का कहना है कि मासिक धर्म के समय पैर और कमर में दर्द होता है। चांदनी भारती का कहना हैं कि पेट, कमर, पैर सब जगह दर्द होता है और वह मासिक धर्म के समय आयरन की गोली खाती हूँ और कपड़ा इस्तेमाल करती हूँ। अंशु ने बताया कि मासिक धर्म के समय कोई दवा नहीं खाती हूँ। जब सर दर्द होता है तो सर दर्द की दवा खाती हूँ। मेडिकल आफिसर डाक्टर ममता चौधरी का कहना है कि दर्द की दवा खाने से आगे कोई बीमारी नहीं होगी लेकिन महिलाएं बिना डाक्टर की सलाह के दवा खाती हैं, क्योंकि महिलाओं में कारण, अज्ञानता और जागरूकता का अभाव हैं। गांव की महिलाएं खून बढ़ाने के लिए गुड़ और चने का उपयोग कर सकती हैं।
चित्रकूट जिला के रगौली गांव की अनीता का कहना है कि गांव में रहने के कारन हम कपड़ा इस्तेमाल करते है, कपड़ा दो बार इस्तेमाल करने के बाद जला देते है। बकटा बुजुर्ग गांव की प्रतिभा देवी का कहना है कि कपड़ा में सोखने की क्षमता ज्यादा होती है इसलिए हम कपड़ा इस्तेमाल करते है। कपड़ा इस्तेमाल करने के बाद धोकर रख देते है। छात्रा बेदवती सेन का कहना है कि पैड में आराम रहता है क्योंकि वह सरकता नहीं है और चलने फिरने में सुविधा होती है। आशा कार्यकर्ता संगीता पाण्डेय का कहना है कि बीमारी बहुत चल रही है इसलिए महिलाओं को पैड इस्तेमाल करना चाहिये। फैजाबाद, नया बाजार सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र का नर्स श्वेता का कहना है कि कपड़ा इस्तेमाल करने से बहुत सी बीमारियां इन्फेक्शन के कारण हो जाती है। इसलिए पैड इस्तेमाल करना चाहिये।
अगर आंकड़ों की भाषा में बात करें तो देश की 12प्रतिशत यानी 35 करोड़ महिलाएं सैनेटरी पैड का इस्तेमाल करती हैं, जबकि 88 प्रतिशत महिलाएं कपड़े, राख, रेत, घास, कागज का प्रयोग करती हैं। इन हालातों में भी सैनेटरी पैड को जीएसटी में विलासिता वस्तु सूची में डाला गया है और उस पर 12 प्रतिशत की जीएसटी दर है, वहीं कंडोम पर जीएसटी का प्रतिशत 0 है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 के अनुसार 70 प्रतिशत महिलाएं मासिक धर्म को गंदा और अछूत मानती हैं। वहीं ग्रामीण भारत में 23 प्रतिशत लड़कियों के स्कूल छोड़ने की वजह मासिक धर्म ही बताया गया है। 89 प्रतिशत महिलाएं कपड़े का प्रयोग करती हैं, 2 प्रतिशत कपास, 2 प्रतिशत राख का इस्तेमाल करती हैं।
मासिक धर्म के लिए बनी शर्म की दीवार को तोड़ने का समय आ गया है, साथ कहना पड़ेगा कि दाग अच्छें हैं और इस शारीरिक प्रक्रिया के लिए हमें शर्माना बन्द करें। सरकार सैनेटरी पैड को भी कर मुक्ति करें, जिससे महिलाएं इसका प्रयोग कर सके।

-अलका मनराल