दलित: काम, पहचान और राजनीति

साभार: विकिमीडिया कॉमन्स

20 मार्च को एससी-एसटी एक्ट में बदलाव करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि अब इस एक्ट के तहत तत्काल गिरफ्तारी नहीं की जाएगी। साथ ही आरोपी को अग्रिम जमानत भी दी जाए। एक्ट के तहत गिरफ्तारी करने से पहले पुलिस को सात दिन के अन्दर जांच करनी होगी और उसके आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। सरकारी अधिकारी की सीधे गिरफ्तारी नहीं होगी। इसके लिए विभागीय उच्चाधिकारी से मंजूरी लेनी होगी। जबकि गैर सरकारी कर्मी की गिरफ्तारी से पहले एसएसपी की मंजूरी लेनी होगी। कोर्ट के इस फैसले के विरोध में पूरे देश में दलित संगठनों ने भारत बंद किया। तो सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल की। हालांकि कोर्ट ने अपने फैसले में बदलाव करने से इनकार कर दिया है।
अगर आपको भी लगता है कि दलित उत्पीड़ण कल की बात हो गई है, तो आपको बता दें कि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार 2014-16 में मध्यप्रदेश, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और गुजरात में दलितों के खिलाफ अपराधों में वृद्धि हुई है। दलित अत्याचार को प्रदेश के आधार पर देखें तो सबसे पहला स्थान उत्तर प्रदेश का है, जहां 2016 में दलित हिंसा के 10426 मामले दर्ज हुए। जो पूरे देश में दलितों के खिलाफ हिंसा का 25.6 प्रतिशत है। वहीं आर्थिक स्तर पर भी दलितों की स्थिति खराब है। जनगणना 2011 के अनुसार 60 प्रतिशत से ज्यादा दलित आबादी किसी भी आर्थिक गतिविधि में शामिल नहीं है। अनुसूचित जाति के 45% परिवारों के पास भूमि नहीं है। 55 प्रतिशत दलित आबादी बटाईदार और खेतिहर मजदूर हैं।
बुंदेलखंड में जाति आधारित भेदभाव देखें तो चित्रकूट जिले के मऊ ब्लॉक के बरगढ़, मनका और तुर्गवा गांवों में चमार जाति के 70 % लोग चमड़ा छिलाई का काम करते थे। लेकिन पिछले 10 सालों में अब इस पेशे में काम करने वालों की संख्या 5% हो गई है। वहीं 20% लोग मोचीगिरी के काम में लग गये हैं। अचानक से इस रोजगार को छोड़ने का कारण भेदभाव है। लेकिन ये भेदभाव अगड़ी जाति द्वारा तो है ही, लेकिन अब उनकी जाति का भेदभाव भी इस रोजगार को छोड़ने का कारण बन गया है। मनका के रहने वाले दद्दू प्रसाद करते हैं कि अपनी ही जाति के भेदभाव के कारण ये काम छोड़ना पड़ा है, अब बच्चों की शादी तो दूसरी जाति में नहीं कर सकते हैं, सो ये रोजगार ही छोड़ दिया। वहीं महेंद्र कहते हैं कि हम काम तो छोड़ चुके हैं, पर कभी किसी की गाय-भैंस मार जाती है तो फिर ये काम कर लेते हैं।
दलितों की शिक्षा का हाल बांदा जिले का बघोलन गांव में देखें, तो वहां के अधिकत बच्चे 5वीं और 8वी से अधिक नहीं पढ़ पाते हैं। न पढ़ने का कारण गांव में आगे की पढ़ाई के लिए विद्यालय न होने के साथ रास्ते में नदी का होना भी है। गांव की शिवकली कहती हैं कि अगर नदी पार कराके बच्चों को पढ़ने के लिए भेजें तो बच्चों को जान का खतरा है। ऐसे हालत में हम बच्चों को विद्यालय नहीं भेजते हैं। ये गांव आदिवासी कोल जाति बहुलक है, जिस पर किसी भी सरकार की नजर नहीं गई। गरीबी के कारण यहां के बच्चे पन्नी बीनने और जंगल से लकड़ी बीनने जैसे काम करते हैं। लल्लू कहते हैं कि गरीबी के कारण लोग शिक्षा के महत्व को नहीं समझते और छोटे बच्चे रोजगार के काम में लग जाते हैं।
देश की जाति व्यवस्था काम पर आधारित थी, नहीं ये कल की बात नहीं हैं बल्कि आज भी लोगों को उनके पुराने काम के हिसाब से ही आंका जाता है। चित्रकूट जिले के रामनगर, अतसुई, छीबो और बंसिग गांव में 68 सफाई कर्मी में से 7 कर्मी कुशवाहा, प्रजापति, गुप्ता जाति से हैं, ये सफाई कर्मी 22 हजार मासिक वेतन तो ले रहे हैं पर सफाई का काम वाल्मीकि, चमार और आदिवासी समुदाय से कराते हैं। काम के बाद इन्हें 200-300 रुपये प्रतिदिन दे दिए जाते हैं। वाल्मीकी जाति के मुकेश कहते हैं कि वह खुद 200-300 रुपये के लिए ये सफाई का काम करता है। वहीं प्रधान त्रिवेणी प्रसाद कहते है, ऐसा होता है कि किसी का काम कोई और कर रहा है, पर हमें तो सफाई से मतलब है, जो हो रही है। सफाई कर्मी के पद में तैनात होने के बावजूद काम किसी अन्य जातियों से करना सरकारी काम के उल्लंघन के साथ संविधान के समानता के अधिकार का भी उल्लंघन है। आपको बता दें कि 22 हजार महीना वेतन मिलने के कारण ये काम और नाम का खेल चल रहा है.
उत्तर प्रदेश में दलित महिलाओं पर होने वाले अत्याचार में बढ़त हुई। 2015 में जहां बलात्कार के 444 मामले प्रदेश में थे, वे 2016 में 557 पर पहुंच गए है। इन हालातों में एससी-एसटी एक्ट को कमजोर करना महिला हिंसा के ग्राफ को और बड़ा सकता है। साथ ही हिंसा के मामले को भी दबा  सकता है, क्योंकि इस कानून से साहस लेकर ही कई हिंसा के मामले प्रकाश में आते थे।
देशभर में पिछले कुछ सालों से दलित समाज के प्रति दबी दुर्भावना खुलकर सामने आई है। जिसका उदाहरण मुंबई आईआईटी के अनिकेत और पीएचडी छात्र रोहित वेमुला की खुदकुशी से लेकर गुजरात के उना में दलितों की पिटाई, सहारनपुर में भड़की दलित हिंसा और पुणे के कोरेगांव में हुई घटनाएं हैं। ऐसी स्थिति में एससी-एसटी एक्ट में बदलाव कहीं न कहीं दलितों को खतरे की घंटी लगती है। वहीं अगड़ी जातियों के लिए एक्ट की धार कुंद करना उनकी खोई सांमतवादी ताकत को कहीं न कहीं दुबारा पाने जैसा है। 2 अप्रैल और 10 अप्रैल को भारत बन्द दलित और अगड़ी जाति के बीच बढ़ते तनाव का एक संकेत था, जो थामा नहीं गया तो भविष्य के लिए ये अच्छा नहीं होगा।  

-अलका मनराल