दलित और आदिवासियों के लिए आबांटित बजट में खर्च कम

unnamedगरीबों और दलितों के नाम पर वोट मांगने वाली ये सरकारें, दलित और आदिवासियों के लिए आबांटित बजट को खर्च नहीं कर पा रही हैं।

28 लाख करोड़ रुपये की यह रकम राशि जिसमें मीड-डे-मील, छात्रवृत्ति, स्कूल निमार्ण, खाद सब्सिडी आदि योजनाओं का भी एक बड़ा फंड बिना खर्च के रखा हुआ है। हैरानी वाली बात है कि यह धन हमारे कृषि बजट से 8 गुना ज्यादा है।  साथ ही इस धन से हम अगले 15 सालों तक गांवों में सड़कों का निर्माण कर सकते हैं। यदि इस धन को देश की अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के 250 करोड़ लोगों में बांट दे  तो प्रत्येक के हिस्से में 11,289 रुपये आएंगे।

हालांकि नीति आयोग इस आबांटित धन पर नज़र रखती है पर इसे खर्च करने का जिम्मा राज्यों और मंत्रालयों के कंधों पर होता हैं।  

28 लाख करोड़ के इस आबांटित धन में दो तरह के धन आते हैं, जिसमें 1974 से 1975 में शुरु हुई जनजातीय उप योजना (टीएसपी) और 1979 से 1980 में आरम्भ हुई अनुसूचित जाति उप योजना (एससीएसपी) के धन हैं।  

देश में इस समय अनुसूचित जाति 16.6 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति 8.6 प्रतिशत में हैं  और इसी के आधार पर अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आम बजट में धन आबांटित भी किया जाता हैं। साथ ही राज्यों पर भी ये बात लागू होती है। केन्द्रीय और राज्य के साथ ही हर मंत्रालय को इस प्रतिशत में जनजातीय उप योजना (टीएसपी) और अनुसूचित जाति उप योजना (एससीएसपी) के लिए धन निकाल पड़ता हैं। ये धन अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के कल्याण और उनके विकास की योजनाओं को बढ़ने के लिए होता है।

उदाहरण के लिए, मानव संसाधन विकास मंत्रालय अपनी दो योजना जिनमें विद्यालयों का निर्माण, पोषण भोजना उपलब्ध कराना और छात्रवृत्ति देना अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को लाभ देने के लिए होती हैं। वैसे ही कृषि मंत्रालय की बीज, खाद सब्सिडी और फसल बीमा जैसी योजनाएं अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को लाभ देने के मकसद से होती हैं।

देखा जाए तो 2005 से 2014 में आंध प्रदेश, उत्तर प्रदेश और पंजाब में अनुसूचित जाति उप योजना (एससीएसपी)  पर खर्च नहीं करने वाले राज्यों की सूची में सबसे आगे हैं। जबकि झारखंड, आंध प्रदेश और ओडिशा जनजातीय उप योजना (टीएसपी) के धन को न खर्च के मामले में आगे हैं।

इस धन के न खर्च करने के नतीजे डरने वाले हैं जबकि अभी तो कुछ सरकारों के खर्चो के आकंडे़ ही उपलब्ध नहीं हैं।

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) ने भी 35 साल से चले आ रहे इस न खर्च होने वाले धन को खर्च करने का तरीका नहीं बदला है।

यही नहीं, प्रधानमंत्री ने भी अपने कार्यकाल के पहले साल में इस बजट का एक बहुत बड़ा हिस्सा बिना खर्च के छोड़ दिया है, जोकि पिछले तीन सालों में सबसे अधिक है।

नियमों के अनुसार वित्तीय साल खत्म होने पर ये बचा धन फिर से केन्द्रीय संसाधन में चला जाता है जिससे ये फिर से प्रयोग में आ जाए। पर वास्तविकता में ऐसा होता नहीं है।

साभार: इंडिया स्पेंड